पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२०१

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राबिन्सन क्रूसो ।

राबिन्सन क्रूसा ।। फ्राइडे-हम लोग मनुष्य मात्र, के नहीं खाते। केवल बन्दी-गणों को ही खाते हैं । | इसके कुछ दिन बाद एक दिन द्वीप के पूरब और पहाड़ की चोटी पर चढ़ कर फ्राइडे एकाएक मारे खुशी के नाचने लगा। मैंने पूछा-क्यों फ्राइडे, क्या है ? कुछ कहा भी ते ।। । फ्राइडे–“अहा, बड़ा आनन्द है, बड़ा महोत्सव है ! प्रभो देखिए, देखिए, यहाँ से मेरा देश देख पड़ता है ।” उसका चेहरा हर्ष से प्रफुल्लित था, दोनों आँखों में प्रेमाश्रु भरे थे, सर्वाङ्ग पुलकित था । धन्य मातृ-भूमि ! एक असभ्य सन्तान के हृदय में भी तुमने कैसा पवित्र प्रीति का संचार कर रखा है। किन्तु उसका यह आनन्द मुझे अच्छा न लगा । मेरे मन में यह खटका हुआ कि यदि फ्राइडे किसी तरह अपने देश को चला गया ते संभव है वह धर्म की शिक्षा और कृतज्ञता भूल कर फिर अपनी पूर्व वृत्ति में प्रवृत्त हो जाय। इसके सिवा यदि वह अपने देश में जाकर मेरी चर्चा चलावे ते आश्चर्य नहीं कि दो तीन सौ आदमी यहाँ आकर भोज में मुझी को स्वाहा कर डालें । मैं उस बेचारे निर्दोषी को दोषी मान कर अविश्वास और उदासीनता की दृष्टि से उसकी ओर देखने लगा । हा, स्वार्थं ऐसा निन्द्य है। स्वदेश के प्रति प्रीति प्रकट करना स्वाभाविक है। अपने देश को दूर से देख कर उसका प्रसन्न होना अयुक्त न था, किन्तु उससे कहीं मेरे स्वार्थ में आघात न लगे, इस आशङ्का से मैं उसके विषभरी दृष्टि से देखने लगा। उसकी यह स्वदेश-प्रीति मेरी आँखों में काँटे की तरह गड़ने लगी। उसका स्वदेशाभिलाष मेरी दृष्टि में घोर अन्याय हुँचने लगा। मैंने अब उसके साथ पहले की तरह बातचीत करना छोड़ दिया। मैं पहले उसे जिस दृष्टि से देखता