पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२५०

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जोवनवृत्तान्त के प्रथम अध्याय का उपसंहार। २२७ हज़ार रुपया भेज दिया और पत्र लिखा कि फिर कुछ सहाय तार्थ भेजेंगा। अपनी दोनों बहनों को भी डेढ़ डेढ़ हज़ार रुपया अर्थात् दोनों के बीच तीन हज़ार रुपया भेज दिया। । उपकारी, सम्बन्धी तथा आनाथ असहाय को -जो कुछ मुझसे बन पड़ा सब कको —मैंने यथायोग्य दिया, किन्तु ऐसी कोई जगह ढूंढ़ने से भी न मिली जहाँ मैं अपने सब रुपयों को निःशक कर रख सकता। कई परिचित व्यक्ति ऐसा न मिला जिसके हाथ इन रुपयों को सौंप कर निश्चिन्त हो जाता। वृद्ध पोडुगीन कप्तान और विधवा कप्तानपत्नी यही दोनों व्यक्ति मेरे प्रति अत्यन्त दयालु थे और इन पर मेरा पूर्ण विश्वास था । किन्तु वे दोनों बहुत वृद्ध हो गये थे, इसलिए उनके पास जमा करने का साहस न होता था । आखिर मैंने आपना रुपयापैसा बाँध कर उगलेंड जाने ही का निश्चय किया । तत्काल मंजिल जाने की बात मुल्तवी रख कर ब्रेज़िल वासो मित्रों के कुशलपत्र और उपहार भेज कर सब वस्तुओं के पाने की सूचना दे दी । इधर सुयोग पाकर चीनी और तम्बाक को बेच डाला । जीवन-वृतान्त के प्रथम अध्याय का उपसंहार मैं अब किस मार्ग से हैंगलैंड जाऊँयही सोचने लगा। यद्यपि जलपथ मेरे भाग्य में वैसा सुखदायी न था फिर भी विशेष रूप से परिचित और सह्य हो गया था। यह सब होने पर भी न मालूम इस द जलपथ से जाने को जी क्यों नहीं चाहता था । मैं बार बार जलथल के भीते की बात सोचने