पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२६७

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राबिन्सन क्रूसो।


दिया था। अब उस स्त्री-रत्न को खोकर मैं एकदम निराश्रय और निरवलम्ब हो गया।

स्त्री के न रहने से मैं फिर अकेले का अकेला रह गया। जब मैं पहले पहल ब्रेज़िल गया था तब जैसे किसी के साथ मेरा परिचय न था वैसे ही अब भी मैं सब के लिए अपरिचित सा हो रहा। द्वीप में जाकर जैसे मैं अकेला रहता था, वैसे ही अब भी रहने लगा। अब मैं क्या करूँगा, यह मेरी समझ में न आता था। मैं अपने भविष्यजीवन को किस तरीके पर बिताऊँगा इसका कुछ निर्णय नहीं कर सकता था। मैंने देखा कि मेरे चारों ओर सभी लोग सांसारिक व्यवहार में लगे हुए हैं। उनमें कितने ही ऐसे हैं जो मुट्ठी भर अन्न के लिए जी तोड़ परिश्रम करते हैं। कितने ही दुर्व्यसन में, आनन्द के अध्यासमात्र का अनुभव कर के, उसीके पीछे हैरान रहते हैं; कितने ही लोग पागलपन ही में मिथ्या आनन्द खोजते रहते हैं। निष्कर्ष यह कि सभी लोगों का भला या बुरा अपना एक उद्देश ज़रूर रहता है। सभी लोग जीने के लिए श्रम करते हैं और श्रम करने के लिए जीते हैं। बिना परिश्रम के कोई रोजी हासिल नहीं कर सकता। जब तक इस शरीर से जीवन का सम्बन्ध बना रहता है तब तक भोजन का सम्बन्ध भी छूटने वाला नहीं। जीवन-धारण के लिए जैसे भोजन अत्यावश्यक है वैसे ही भोजन प्राप्त करने के लिए शरीर-परिचालन भी नितान्त आवश्यक है। सभी लोग कमाते कमाते मर मिटते हैं पर वास्तविक सुख किमी को नहीं मिलता। इस शरीर-यात्रा के साथ अपनी द्वीपान्तर की शरीर-यात्रा की तुलना करने से वह सुगम जँचती थी। मैं अपने प्रयोजन से अधिक अन्न न उपजाता था। वहाँ सन्दूक़ में