पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२७७

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राबिन्सन क्रूसो ।

२४ राबिन्सन क्रस । था। हमारे जहाज़ के डाक्टर ने ३०, ३२व्यक्तियों की नस काट कर रक्तनिकाल दिया जिससे उन लोगों का आवेग शान्त हुआ। उन लोगों में दो व्यक्ति पादरी थे । एक वृद्ध था और दूसरा युवा । किन्तु आश्चर्य का विषय यह था कि उस वृद्ध की अपेक्षा वह नवयुवक धमविश्वास और इन्द्रियनिग्रह में बढ़ कर था । वृद्ध ने हमारे जहाज़ पर आकर ज्यों ही देखा कि अब प्राण बच गये त्योंहीं वे धड़ाम से गिर कर एकदम सूचित हो गये । हमारे डाकुर ने दवा देकर और रक्त-मोक्षण करके उन्हें सचेत किया । तब वे एक रमणी का इलाज करने गये। थोड़ी देर बाद एक आदमी ने डार से जाकर कहा कि वह वृद्ध पुरोहित पागल हो गये हैं । तब डाकृर ने उनको नींद आने की दवा दी । कुछ देर बाद उन्हें अच्छी नींद आ गई । दूसरे दिन सबेरे जब वे जागे तब भलेचंगे देख पड़े । युवा पुरोहित ने अपने आत्मसंयम और प्रशान्त चित्त का अच्छा परिचय दिया था। उन्होंने हमारे जहाज़ पर पैर रखते ही ईश्वर के सटाङ्ग प्रणाम किया । मैंने समझा कि शायद उन्हें मूच्र्यु हो आई है, इससे मैं झटपट उन्हें उठाने गया। तब वे सिर उठा कर धीर गम्भीर खर से बोले-मुझे कुछ नहीं हुआ है, मैं परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहा हूँ, इसके बाद आपको भी धन्यवाद अँगा ?’ उनको ईश्वरोपासना के समय बाधा देकर मैं सन्तप्त हुआ । कुछ देर बाद वे उठ कर मेरे पास आये और आंसू भरे नयन से उन्होंने मुझको धन्यवाद दिया । मैंने उनसे कहा मैंने धन्यवाद प्रा की कौन सा काम किया है । मैंने उसी कर्तव्य का पालन किया है जो मनुष्य के प्रति मनुष्य का है ।