पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२८२

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दूसरी बार की विदेश-यात्रा । २8 के विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकता था, यद्यपि जहाज़ का कप्तान वही था। यदि किसी स्थान में जहाज़ लगा कर खाद्य सामग्री खरीदनी पड़ती तो वह भी मुझे स्वीकार था, पर भूखों को न खिला कर मैं अपना पेट कैसे भरता लोगों ? हम के पास यथेष्ट खाद्यवस्तु थी। मार्ग में कहीं कुछ मोल लेने का अवसर प्राप्त होने की संभावना न थी। हमने उन लोगों को भोजन दिया । किन्तु वे लोग खाना पाकर भी बड़ी विपदा में पड़े। जो कुछ थोड़ा सा खाने को दिया वहीदीर्घ उपवास के बाद, उन लोगों के पेट में गुरु पाकी हो गया । यदि वे लोग अपनी अवस्था पर ध्यान न देकर अधिक खा बैठते तो बड़ी कठिनता होती। कितने ही लोग कgालरूप हो गये थे, ठठरी मात्र बन रही थी। मैंने सब को सावधान कर के थोड़ा थोड़ा खाने को कहा । कोई कोई तो दो एक कौर खाते ही वमन करने लगे । तब डाकुर ने उन लोगों के भोजन में एक प्रकार की दवा मिला दी। इससे उन लोगों को कुछ आराम मिला । कोई खाने की वस्तु को बिना चबाये ही गट गट निगलने लगा । दे मनुष्यों ने इतना खाना खाया था कि अन्त में उनका पेट फटने पर हो गया। इन लोगो का कष्ट और अवस्था देख कर मेरा हृदय दया से द्रवित हो उठा था । मैं अपने ऊपर की बीती बात सोचने लगा। जब मैं पहले पहल उस जनशून्य द्वीप में जा पड़ा था तब मेरे पास एक मुट्ठी अन्न का भी कोई उपाय न था । यदि मुझे कुछ खाने को न मिलता तो मेरा भी ऐसी ही भयकर और शोचनीय दशा होती । जो लोग चलने में एक दम असमर्थ होगये थे उन लोगों के लिए उन्हीं के ,जहाज़ पर थाल भर पावरोटी और मांस