पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२८३

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राबिन्सन क्रूसो
झूले।

भेज दिया । डाक्टर ने मांस पकाने की व्यवस्था करके रसेई घर में इसलिए पहरा बैठा दिया कि कोई कच्चा ही मांस न खा ले । मांस का शोरवा तैयार हो जाने पर हर एक को थोड़ा थोड़ा देने की व्यवस्था कर दी । इस प्रकार सख्त ताकीद से डाकृर साहब ने उनमें कई एक व्यक्तियों को मृत्यु के मुख से बचाँ लिया । नहीं तो चान्द्रायण व्रत के अनन्तर एकाएक अपरिमाण भोजन से विश्चिका का भयडर आक्रमण हुए बिना न रहता । उन उपेक्षित तथा अनात तीन यात्रियों को मैं स्वयं उनके जहाज़ पर देखने गया था। जहाज़ के कितने ही सुधार्त व्यक्ति चूल्हे पर से कच्चा खाद्य लेने के लिए हल्ला मचा रहे थे । रसोईघर के पहरेदार उनको समझा बुझाकर रोकने में असमर्थ होकर बल से काम ले रहे थे । जबर्दस्ती हाथ पकड़ पकड़ कर उन्हें हटा रहे थे और बीच बीच में उन्हें थोड़ा सा बिस्कुट देकर शान्त भी किये जा रहे थे । नहीं तो वे लोग खाने के लिए प्राण तक देने को मुस्तैद थे । भूख ऐसी ही अदम्य राक्षसी है ! उनमें तीन मुसाफिरों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी । उन लोगों के पास खाने की कुछ भी वस्तु न थी और न किसी से उन्हें कुछ सहायता ही मिली । छः सात दिन से वे लोग एकदम निराहार थे । इसके पूर्व भी कई दिनों से उन लोगों ने पेट भर कर न खाया था । माँ स्वयं न खा कर अपना अंश अपने बेटे को खिला दिया करती थी, इससे वह एकदम खेज में सट गई थी । यद्यपि वह अभी तक मरी नहीं है पर उसके मरने में अब कुछ देर नहीं है । मैंने चमंच से थोड़ा सा झोल उसके मुंह में डाला । इस पर वह कुछ बोल