पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३७१

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राबिन्सन क्रूसो।

३४६ राबिन्सन क्रसे। ' नीय हो उठती। भतीजे ने मुझसे नाविकों के असहनीय संकल्प की बात कही । मैंने उससे कहा कि इसके लिए चिन्ता करने से कोई फल न होगा । मेरा मालअसबाब और कुछ रुपया मुझको देते जाओ, तो मैं किसी तरह देश लौट जाऊँगा। इस बात से मेरा भतीजा अत्यन्त दुखी हुआ किन्तु इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के सिवा और उपाय ही क्या था ? उसने जहाज़ पर लौट कर नाविकों से कहा कि मेरे चचा अब इस जहाज़ पर न जायेंगे तब सभी नाविक अपन अपने काम पर गये । मेरे भतीजे ने मेरी सब चीजें जहाज़ पर से उतार दीं । मैं अपने देश से बहुत दूर अपरिचित देश में निर्वासित हुआ । मैं छाती को पत्थर सी किये खड़ा खड़ा देखता रहा। सचमुच ही जहाज़ मुझको छोड़ पाल तान कर चल दिया। मेरा भतीजा मेरे आश्वासन के लिए एक किरानी और अपने एक नौकर को मेरे पास छोड़ गया । मैंने एक अँगरेज़ रमणी के घर में डेरा किया। वहाँ कई एक फ्रांसदेशी, यहूदी, और एक व्यवसायी अँगरेज भी पहले ही से ठहरा था । यहाँ मुख स्वच्छन्द से मैंने नौ दस महीने बिताये । मेरे पास काफी रुपये थे और कुछ वाणिज्य की वस्तुएं भी थीं । उन वस्तुओं को बेच कर मैंने अच्छे हीरे मोल लिये । अब मैं बेख़ौफ़ अपने सर्वस्ख को साथ ले कर देश लौट जा सऊंगा। क्रमा का वाणिज्य मेरा बहुत समय भारतवर्ष के पूर्वी भाग बढ़ाल में ही बीत गया । देश लौटने के जितने उपाय मुझे बतलाये जाते थे