पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३७२

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क्रूसो का वाणिज्य ।

। कूल का वाणिज्य । ३४७ उन में एक भी मेरे पसन्द न आता था। आख़िर एक दिन ग रेज़ वणिक् ने मुझसे कहा-आप मेरे स्वदेशी हैं । आपसे मुझे एक प्रस्ताव करना है। मैं आशा करता हूं कि आप उससे असन्तुष्ट न होंगे । हम लोग देश से बहुत दूर आ पड़े हैं आप दैवयोग से और मैं अपनी इच्छा से। किन्तु परिणाम में दोनों की अवस्था अभी बराबर है। जो हो, परन्तु यह देश ऐसा है कि यहाँ वाणिज्य करने से अपने देश की एक मुट्ठी धूल के बदले मुट्ठी भर सेना मिल सकता है । आइए, दस हजार रुपया आप दीजिए और दस हज़ार में देता हूं। हम लोगों की पसन्द लायक यदि कोई जहाज़ मिल जाय तो भाड़े पर लेकर हम लोग चीन वालों के साथ उस मूलधन से व्यवसाय करने जायेंगे । आप होंगे जहाज़ के अध्यक्षों और मैं बहँगा व्यापारी। आलसी होकर समय बिताना ठीक नहीं । संसार में कई निर्यावसायी नहीं है। सभी अपनी अपनी उन्नति में लगे रहते हैं। सभी कर्मशील हैं। ग्रहनक्षत्र भी एक जगह बैठे नहीं रहते । सभी जीव जब आपने अपने काम पर तत्पर रहा करते हैं तब हम लोग मौन साध कर क्यों बैठे रहें १ यह प्रस्ताव मुझे अच्छा लगा। यद्यपि वाणिज्य मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं तथापि भ्रमण ही सही। जिस देश को मैंने पहले कभी नहीं देखा है उसके देखने की लालसा मेरे मन में जागती ही रहती थी। वहाँ जाने की संभावना मेरे लिए कभी आप्रोतिकारक नहीं हो सकती थी । में मनोनुकूल जहाज़ मिलने में बहुत दिन लगे । जहाज़ मिला भी तो अँगरेज़ नाविक नहीं मिलते थे। बड़े बड़े कष्ट से में, एक माँझी और एक गोलन्दाज़ का प्रबन्ध किया ।