पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/४०७

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राबिन्सन क्रुसो।

३० राबिन्सन क्रसो। पर धनसम्पत्ति, सम्मान, और यश आदि सभी सुखोत्पादक

विषय तुच्छ जान पड़ते हैं । सूर्यचन्द्र का प्रकाश, वायु,

मीठा जल और एक मुट्ठी अन्न तथा शारीरिक स्वास्थ्य ही - प्राणियों के परममित्र हैं । इतनी वस्तुएं मिल जाये तो शरीर - यात्रा के लिए और कुछ दरकार नहीं । धर्म ही मनुष्य को सभी यन्त्रणाएँ सहनेप्रकृत महरव प्राप्त करनेदुःख में सुख पाने और सांसारिक वासनाओं को जीतने की शिक्षा देता है । जो सर्वश्रेष्ठ पुख के निधान आनन्द स्वरूप हैं उनका साक्षात् परिचय होने से तुच्छ वस्तुओं की ममता नहीं रहने पाती। परम आनन्द पाकर दुःख के समीप कौन जाना चाहेगा ? उनका यह आध्यात्मिक भाषण सुन कर मैंने निश्चय किया कि इस तरह की मानसिक अवस्था ही प्रकृत राजत्व है । जिसका मन ऐसा है वही सम्राट है । वही महाराजों का र, ", महाराज है। चाह घटी चिन्ता गई मनु वे परवाह। जाको कछ न चाह है से शहनपति शाह ॥ इन धार्मिक नर नारियाँ की सहूति में हम लोगों के आठ महीने बड़े सुख से कटे। जाड़ा भी बीत चला । अब रा, ज़रा ज़रा दिन का प्रकाश भी दिखाई देने लगा । मैं मई महीने में यात्रा का ठीकठाक करने लगा। मैंने उन शानोपदेशक महाशय से कहा, ‘यदि आप चाहें तो मैं आपको छिपाकर किसी अच्छी जगह पहुंचा सकता हूँ ।’ उन्होंने इसके लिए मुझको धन्यवाद देकर कहा-महाशय, अब आप मुझको ऐसा प्रलोभन न दें। मन बड़ा ही दुर्बल होता है । इतने दिनों की साधना एक ही घड़ी में खो बैटूगा । मैं जहाँ . वह रहूंगा। .