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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१२०२

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सप्तम सोपान, उत्तरकाण्ड ।

बिज्ञान-रूपिनी, बुद्धि बिसद घृत पाइ।

चित्त दिया भरि घरइ दृढ़, समता दियटि बनाइ ।

तब विज्ञान रुपिणी धुद्धि स्वच्छ यी पा फर चित रूपी दिशा में भरे और ममता रूपी स्थायी दीवट बना कर उसपर धरे।

तीनि अवस्था तीनि गुन,तेहि कपास त काढ़ि।

तूल तुरीय सँवारि पुनि, बाती करइ सुगादि ।

(जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) ताने अवस्था और (सत्व, रज, तम) तीनों गुण रूपी कपास के से तुरीयावस्था रूपी गई निकाल कर फिर सुन्दर मोटी बच्ची सजा पर बनाये। तुरीयावस्था मोक्ष है। पास के ढोढ़ में तीन भाग और प्रत्येक भाग में एक पक रेखाएँ होती है । इस अभदत्व में सभेद रूपक है।

सो०-यहि बिधि लेसइ दीप, तेजरासि बिज्ञान-मय ।

जातहिं जास समीप, जरहि मदादिक सलभ सच ॥११७॥

इस तरह तेजोराशि विज्ञान रूपी दीपक जलावे, जिसके समीप में जाते ही मदाहिक रूपी समस्त फवि-मम हो जाते हैं ॥११७॥

चौ०-२ ०-सोहमस्मि इति वृत्ति अखंडा । दीप लिखा सोइ परम प्रचंडा ॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब मवसूल भेद स्वम नासा ॥१॥

यह श्वर मैं हूँ, यह माण्ड वृत्ति हो दीपफ की अत्यन्त प्रचण्ड' लौ है। त्मिा का आनन्द अनुभव करना सुन्दर उलेला है, तब संसार का मूल भेद भ्रम दूर हो जाता है ।।१॥

प्रयल अविशा कर परिवारा मोह आदि तम मिटाइ अपारा॥

तय सोइ बुद्धि पाइ उँजियारा । उरे गृह बइठि भन्थि निरुआरा ॥२॥

अविद्या-माया के पलवान कुटुम्ही अज्ञान श्रादि का प्रार अंधकार मिट जाता है। तय उस उजेले को पा कर बुद्धि रूपिणी स्त्री हृदय रूपी भवन में बैठ कर गाँठ छुड़ाती है ॥२॥

छोरन ग्रन्थि पान जाँ साई। तो यह जीव कृतारथ हाई ॥

छोरत ग्रन्थि जानि खगराया । बिधन अनेक करइ तब माया ॥३॥

यदि यह गाँउ छुड़ाने पावे तो यह जीव सफल मनारथ हो। परन्तु हे खगराज ! गाँठ छोड़ते जान कर तप माया अनेक प्रकार का विन्न करती है ॥३॥

समा की प्रति में 'छोरन अन्थि पाव जो कोई पाठ है। कोई से पया प्रयोजन ? यहाँ तो गाँठ छोड़नेवाली वहीं पुद्धि रूपिणी स्त्री है।

रिद्धि सिद्धि प्रेरह बहु भाई। बुद्धिहि लोभ देखावहिँ आई ॥

कल बल छल करि जाहि समीपा । अजल बात बुझावहिँ दीपा ॥

हे भाई । बहुत सी अद्धि और सिद्धियों को भेजती है, वे आकर बुद्धि को लाभ दिखाती है। बराक साल पास में जाती है और आँघर के घायु से दीपक को दुमा देती हैं।