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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१२११

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रामचरित मानस ।

दो-एक व्याधि बस नर मरहिँ, ये असाधि बहु व्याधि ।

पीड़हिँ सन्तत जीव कहँ, सो किमि लहइ समाधि ॥

एक ही रोग के अधीन होकर मनुष्य मरते हैं, ये बहुत सी असाध्य व्याधियाँ जीव को सदा दुःख दिया करती हैं फिर वह कैसे सुख पा सकता है ।

मनुष्य को दुःख के लिये एक ही रोग काफी है, साथ ही अन्य रोगों का उपस्थित रहना चितीय समुच्चय अलंकार' है।

नेस घरमा आचार तप, ज्ञान जज्ञ जप दान ।

भैषज पुनि कोटिक नहीं, रोग जाहिँ हरिजान ॥१२१॥

नेम, धर्म, आचार, तपस्या, पान, यज्ञ, जप और दान मादि फिर करोड़ों औषधियाँ हैं, परन्तु हे हरियान ! रोग जाते नहीं ॥१२॥

रोग छूटने का कारण नेम धर्मादि श्रीपधि रूप वर्तमान हैं, तो भी रोग का न छूटना विशेषोक्ति अलंकार' है।

चो-एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भयप्रोतिबियोगी ।

मानसरोग कछुक मैं गाये । हैं सब के लख बिरलन्हि पाये ॥१॥

इस तरह जगत के समस्त जीव शोक, हर्ष, भय और प्रीति के अधीन वियोगी होकर रोगी है । मैं ने थोड़ा सा मानसरोग वर्णन किया है, ये हैं सबको परन्तु इनका लखाव विरले ही मनुष्य पाते हैं ॥१॥

जाने से छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥

विषय कुपथ्य पाइ अङ्कुरे । मुनिहु हृदय का नर बापुरे ॥२॥

ये पापी (राग) जान लेने से कुछ कम हो जाते हैं, पर मनुष्यों को कष्ट देनेवाले नाश नहीं होते। विषय रूपी कुपथ्य पाकर मुनियों के मन में उत्पन्न हो जाते हैं, तब बेचारे मनुष्य क्या चीज़ हैं ? (कुछ नहाँ) ॥२॥

जव विषयों का कुपथ्य पाकर यह रोग मुनियों के मन में पैदा होजाता है, तब वपुरा मनुष्य या चीज़ है 'काव्यापिति अलंकार' है।

रामकृपा नाहिं सब रोगा। जाँ एहि भाँति बनइ सञ्जोगा ॥

सदगुरु बैद बचन बिस्वासा । सञ्जम यह न विषय के आसा ॥३॥

रामचन्द्रजी की कृपा से यदि इस तरह संयोग बन जाय तो सब रोग नाश हो जाते हैं। श्रेष्ठ गुरु कपी वैद्य के वचनों में विश्वास हो और संयम यह कि विषयों की आशा न रक्खे ॥३॥

रघुपतिप्रगति' सजीवन मूरी । अनूपान सहा मति पूरी॥ ॥

एहि विधि भलेहि सोरोग नसाहीं। नाहित जतन कोटि नहिं जाहीं॥४॥

रघुनाथजी की भक्ति सम्जीवनी जड़ी (अमृत) है और श्रद्धासे भरी हुई बुद्धि ही अनुपात है। इस प्रकार भले ही पे रोग नष्ट होते हैं नहा करोड़ों यत्न करने पर नहीं छूटते ॥४॥