पूछेउ तब सिव कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥
जौँ महेस मोहि आयसु देहौँ। कछु दिन जाइ रहउँ मिस एहीँ॥३॥
तब शिवजी से पूछा, उन्होंने बखान कर कहा, पिता के घर यज्ञोत्सव, सुन कर कुछ प्रसन्न हुई। मन में सोचा कि यदि शङ्करजी आशा दें, तो कुछ दिन इसी बहाने जा कर पिता के यहाँ रहूँ॥३॥
पति-परित्याग हृदय दुख भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥
बाली सती मनोहर बानी। भय सङ्कोच प्रेम रस सानी॥४॥
पति के त्याग देने का हृदय में भारी दुःख है, पर अपना अपराध समझ कर कहती नहीं। भय लाज और प्रेम-रस से मिली हुई मनोहर वाणी से सती बोली॥२॥
दो॰ – पिता भवन उत्सव परम, जौँ प्रभु आयसु होइ।
तो मैँ जाउँ कृपायतन, सादर देखन सोइ॥६१॥
हे कृपा के स्थान प्रभो! मेरे पिता के घर परमोत्सव है, यदि आशा हो तो मैं आदर के साथ उसे देखने जाऊँ॥६१॥
चौ॰ – कहेहु नीक मोरे मन भावा। यह अनुचित नहिँ नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरे बयर तुम्हहुँ बिसराई॥१॥
शिवजी ने कहा – अच्छा कहती हो, मेरे मन को सुहाता है, पर अनुचित तो यह है कि उन्होंने नेवता नहीं भेजा। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया; किन्तु हमारे बैर से तुम्हें भी भुला दिया॥१॥
ब्रह्म-सभा हम सन दुख माना। तेहि तेँ अजहुँ करहिं अपमाना॥
जौँ बिनु बोले जाहु भवानी। रहइ न सील सनेह न कानी॥२॥
ब्रह्मा की सभा में हम से अप्रसन्न हुए थे, उसी से अब (यज्ञ में) भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी! जो 'तुम बिना बुलाये जाओगी तो शील न रहेगा, न स्नेह और न मर्यादा ही रह जायगी॥२॥
जदपि मित्र-प्रभु-पितु-गुरु गेहा। जाइय बिनु बोले न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गये कल्यान न होई॥३॥
यद्यपि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के स्थान में बिना बोलाये जाना चाहिए, इसमें सन्देह नहीं तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो तो वहाँ (इन स्थानों में भी) जाने से कल्याण नहीं होता॥३॥