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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१४३

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रामचरित मानस।

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवन उजरउ नहिँ डरऊँ॥
गुरु के बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥४॥

नारदजी के उपदेश को मैं न छोडूंगी, घर बसे या उजड़े इससे नहीं डरती हूँ। गुरु के वचनों में जिसे विश्वास नहीं है, उसको सुख की सिद्धि स्वप्न में भी सुलभ नहीं होती॥४॥

दो॰ – महादेव अवगुन अवगुन भवन, बिष्नु सकल-गुन-धाम।
जेहि कर मन रम जाहि सन, तेहि तेही सन काम ॥८०॥

महादेव अवगुणों के घर हैं और विष्णु सम्पूर्ण गुणों के धाम हैं, पर जिसका मन जिससे रमता है, उसको उसी से काम है॥८०॥

चौ॰ – जौँ तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥
अब मैं जनम सम्भु हित हारा। को गुनदूषन करइ विचारा॥१॥

हे मुनीश्वरो! जो आप लोग पहले मिले होते तो मैं आप ही की शिक्षा सुनती और शिरोधार्य करती। पर अब मैं ने अपना जन्म शङ्करजी के लिए हार दिया, गुण दोष का विचार कौन करे?॥१॥

जौँ तुम्हरे हठ हृदय बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किये बरेषी॥
तौ कौतुकिअन्ह आलस नाहीँ। वर-कन्या अनेक जग माहीं॥२॥

यदि आप लोगों के मन में बहुत ही हठ है, वरच्छा (वर कन्या के सम्बन्ध में विवाह की बातचीत पक्की) किये बिना नहीं रहा जाता है, तो वर कन्या असंख्यों संसार में भरे हैं, खेलवाड़ियों को आलस्य नहीं (जा कर सगाई कराइये)॥२॥

जनम कोटि लगि रगरि हमारी। बरउँ सम्मु न त रहउँ कुँआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिँ सत बार महेसू॥३॥

करोड़ो जन्म तक हमारी रगड़ है कि शिवजी से विवाह करूँगी नहीं तो कुँवारी रहूँगी। नारदजी के उपदेश को न छोडूंगी चाहे सैकड़ों बार आप ही शिवजी क्यों न कहे॥३॥

मैं पाँ परउँ कहइ जगदम्बा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलम्बा॥
देखि प्रेम बोले मुनि ज्ञानी। जय जय जगदम्बिके भवानी॥४॥

जगत् की माता पार्वतीजी कहती हैं कि मैं पाँव पड़ती हूँ, बड़ी देरी हुई, आप लोग अपने घर जाइये। इस तरह अचल प्रेम देख कर ज्ञानीमुनि बोले – हे जगन्माता भवानी! आप की जय हो! जय हो!॥४॥ सप्तर्षि आदर के योग्य महाज्ञानी हैं, किन्तु पतिनिन्दा के दोष से पार्वतीजी का उनके प्रति अश्रद्धा प्रकट कर शीघ्र चले जाने की प्रार्थना करना 'तिरस्कार अलंकार' है।