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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१५९

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रामचरित-मानस।

धरि धीरज तहाँ रहे सयाने। बालक सब लेइ जीव पराने॥
गये मवन पूछहिँ पितु माता। कहहिँ बचन भय कम्पित गाता ॥३॥

चतुर लोग धीरज धर कर वहाँ रहे और सब लड़के जी लेकर भाग गये। घर जाने पर उनके माता-पिता पूछते हैं, भय से शरीर कापते हुए वे वचन कहते हैं ॥३॥

बाहनों और बालकों का अयथार्थ भय वर्णन 'भयानक रसाभास' है।

कहिय काह कहि जाइ न बाता। जम कर धारि किधौँ बरियाता॥
बर बौराह बरद असवारा। व्याल कपाल बिभूषन छारा ॥४॥

क्या कहूँ? बात कही नहीं जाती है, यह यमराज की सेना है, या कि बरात है। दूलह पागल है और बैल पर सवार है। साँप, नर-खोपड़ी और राख ही उसके गहने है ॥४॥

हरिगीतिका-छन्द।

तन छार ब्याल कपाल भूषन, नगन जटिल भयङ्करा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि, बिकट-मुख रजनीचरा॥
जो जियत रहिहि बरात देखत, पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाह घर घर, बात असि लरिकन्ह कही ॥९॥

शरीर पर भस्म, साँप और खोपड़ी का गहना, नङ्गा, जटाधारी और डरावना है। साथ में भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनी तथा विकराल मुखवाले राक्षस है। जो बरात देख कर जीता रहेगा, सचमुच उसका बड़ा भारी पुण्य है और वही पार्वती के विवाह को देखेगा। इस तरह की बात घर घर लड़कों ने कही ॥९॥

दो॰—समुझि महेस समाज सब, जननि जनक मुसुकाहिँ।
बाल बुझाये बिबिध विधि, निडर होहु डर नाहिँ ॥९५॥

सब शिवजी के समाज को समझ कर माता-पिता मुस्कुराने लगे। उन्होंने बहुत तरह से बालकों को समझाया कि कोई डर नहीं है, तुम लोग निर्भय रहो ॥९५॥

चौ॰—लेइ अगवान बरातहि आये। दिये सबहि जनवास सुहाये॥
मैना सुभ आरती सँवारी। सङ्ग सुमङ्गल गावहिँ नारी ॥१॥

अगवानी लोग बरात को ले आये और सभी को सुहावने जनवास दिये। मैना सुन्दर आरती सजाकर, स्त्रियों के साथ श्रेष्ठ मङ्गल के गीत गाती हैं ॥१॥

कञ्चनथार साेह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
विकट-बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेखा ॥२॥

उत्तम सुवर्ण का थाल हाथ में शोभित है,प्रसन्नतासे शिवजी को परछने (आरती उतारने) चली। जब रुद्र का भीषण रूप देखा, तब स्त्रियों के हृदय में बहुन ही डर उत्पन्न हुआ ॥२॥

स्त्रियों का अयथार्थ भय 'भयानक रसामास' है।