तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनङ्ग-अराती॥
राम सो अवध-तृपति-सुत साई। की अज अगुन अलख-गति कोई ॥४॥
हे काम के शत्रु! फिर दिनरात आदर के साथ आपभी राम राम जपते हैं। वह राम वही अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं कि कोई अप्रत्यक्ष, निर्गुण और अजन्में (कभी शरीर न धारण करनेवाले) हैं ॥४॥
दो॰—जौँ नृप-तनय त ब्रह्म किमि, नारि बिरह मति भोरि।
देखि चरित महिमा सुनत, भ्रमति बुद्धि अति माेरि ॥१०८॥
यदि राजपुत्र हैं तो वे ब्रह्म कैसे हो सकते हैं? जिनकी बुद्धि स्त्री के वियोग से वावली हुई थी, उनका चरित्र देख कर और महिमा सुन कर मेरी बुद्धि बड़े भ्रम में पड़ी है ॥१०८॥
चौ॰—जौँ अनीह व्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥
अज्ञ जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि विधि मोह मिटइ सोइ करहू ॥१॥
यदि निस्पृह व्यापक ब्रह्म कोई दूसरा है तो हे नाथ! वह भी मुझे समझा कर कहिए। नासमझ जान कर मन में क्रोध न लाइये, जिस तरह मेरा अज्ञान मिटे वहीं कीजिए ॥१॥
मैँ बन दीख राम प्रभुताई। अति-भय-विकल न तुम्हहिँ सुनाई॥
तदपि मलिन मनबोधन आवा। साे फल भली भाँति हम पावा ॥२॥
मैं ने रामचन्द्रजी की प्रभुता वनमें देखी, पर अत्यन्त भयसे व्याकुल होकर आपको नहीं सुनाया। तो भी मेरे पापी मन को ज्ञान न हुआ, उसका फल हमने भली भाँति पाया ॥२॥
अजहूँ कछु संसय मन मोरे। करहु कृपा विनवउँ कर जोरे॥
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा ॥३॥
अब भी मेरे मन में कुछ सन्देह है, मैं हाथ जोड़ कर विनती करती हूँ, कृपा कीजिए। तब स्वामी ने मुझे बहुत तरह से समझाया था, हे नाथ! वह समझ कर क्रोध न कीजिए ॥३॥
तब कर अस बिमाेह अब नाहीँ। राम-कथा पर रुचि मन माहीँ॥
कहहु पुनीत राम-गुन-गाथा। भुजगराज-भूषन सुर-नाथा ॥४॥
तब के ऐसा अज्ञान अब नहीं है, मन में रामकथा में रुचि है। हे शेषनाग के भूषण धारण करनेवाले देवताओं के मालिक! रामचन्द्रजी के पवित्र गुणों की कथा कहिए ॥४॥
दो॰—बन्दउँ पद धरि धरनि सिर, विनय करउँ कर जोरि।
बरनहु रघुबर-बिसद-जस, स्त्रुति-सिद्धान्त निचोरि ॥१०९॥
मैं धरती पर मस्तक रख आप के चरणों की वन्दना कर हाथ जोड़ विनती करती हूँ। वेद का सिद्धान्त निचोड़ कर रघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन कीजिए ॥१०९॥