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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१७६

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प्रथम सोपाम, बालकाण्ड।

बन्दउँ बाल-रूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मङ्गल-भवन अमङ्गल-हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर-बिहारी ॥२॥

मैं उन बालक-रूप रामचन्द्रजी को प्रणाम करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त होती हैं। मङ्गल के स्थान, अमङ्गल के हरनेवाले और महाराज दशरथ के आँगन में विहार करनेवाले, वे ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हो ॥२॥

करि प्रनाम रामहिँ त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥
धन्य धन्य गिरिराज-कुमारी। तुम्ह समान नहिँ कोउ उपकारी ॥३॥

रामचन्द्रजी को प्रणाम करके शङ्करजी हर्षित होकर अमृत के समान (मधुर) वाणी बोले। हे पर्वतराज की कन्या! धन्य हो, धन्य हो, तुम्हारे समान कोई परोपकारी नहीं है ॥३॥

पूछेहु रघुपति-कथा प्रसङ्गा। सकल-लोक जग-पावनि गङ्गा॥
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कोन्हिहु प्रस्न जगत-हित लागो ॥४॥

तुमने रघुनाथजी की कथा के सम्बन्ध में पूछा, जो जगत् में सब लोगों को पवित्र करने के लिये गङ्गा है। तुम रघुवीर के चरणों की प्रेमी हो, संसार की भलाई के लिए प्रश्न किया है ॥४॥

दो॰—रामकृपा तेँ पारबति, सपनेहुँ तब मन माहिँ।
सोक मोह सन्देह भ्रम, मम बिचार कछु नाहिँ ॥११२॥

हे पार्वती! रामचन्द्रजी की कृपा से तुम्हारे मन में मेरे विचार से शोक, मोह, सन्देह, भ्रम कुछ स्वप्न में भी नहीं है ॥११२॥

गुटका में 'राम कृपा ते हिमसुता' पाठ है, पर वह ठीक नहीं है। हिमगिरिसुता शुद्ध है न कि हिमसुता।

चौ॰—तदपि असङ्का कीन्हिहु साेई। कहत सुनत सब कर हित हाई॥
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिँ काना। खवन-रन्ध्र अहि-भवन समाना ॥१॥

तो भी वह बिना सन्देह का सन्देह तुमने किया, जिसके कहने सुनने में सब की भलाई होगी। जिन्होंने भगवान की कथा कान से नहीं सुनी, उमके कान के छेद साँप के बिल के समान हैं ॥१॥

नयनन्हि सन्त दरस नहिँ देखा। लोचन माेर-पड़्ख कर लेखा॥
ते सिर कटु-तूँचरि समतूला। जे न नमन हरि-गुरु-पद-मूला ॥२॥

सन्तों को देख कर जिन आँखों ने अवलोकन नहीं किया, उन नेत्रों की गिनती मुरैले के पट्टे की है। वे सिर तितलौकी के समान हैं, जो हरि और गुरु के चरणों में नमित नहीं होते ॥२॥