सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/१८६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१३१
प्रथम सोपान, बालकाण्ड।

सो सम्बाद उदार, जेहि बिधि भा आगे कहब।
सुनहु राम अवतार, चरित परम सुन्दर अनघ॥

वह श्रेष्ठ सम्बाद जिस तरह हुआ वह मैं आगे कहूंगा। पहले रामचन्द्रजी के जन्म का अत्यन्त सुन्दर पवित्र चरित्र सुनो।

हरि गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार, कहउँ उमा सादर सुनहु ॥१२०॥

भगवान् के गुण और नाम अपार हैं, उनकी कथा का रूप अपरिमित और अनन्त है। हे उमा! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ, तुम आदर-पूर्वक सुनो ॥१२०॥

चौ॰—सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाये। बिपुल बिसद निगमागम गाये॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न साई ॥१॥

हे गिरिजा! सुनो, भगवान् के सुन्दर विशाल निर्मल चरित्र वेद और शास्त्रों ने गान किया है। ईश्वर का अवतार जिस कारण से होता है, वह नहीं कहा जा सकता कि यह ऐसा ही है। अर्थात् असंख्यों कारण एकत्र होने पर परमात्मा का अवतार होता है ॥१॥

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहिँ सयानी॥
तदपि सन्त मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिँ स्वमति अनुमाना ॥२॥

हे सयानी! सुनो, हमारा सिद्धान्त तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से रामचन्द्रजी तर्कना करने योग्य नहीं हैं। तो भी सन्त, मुनि, वेद और पुराणों ने जैसा कुछ अपनी अपनी धुद्धि के अनुसार कहे हैं ॥२॥

तस मैँ सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन माेही॥
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़इ असुर अधम अभिमानी ॥३॥

हे सुमुखी! जैसा कारण मुझे समझ पड़ता है, वैसा मैं तुमको सुनाता हूँ। जब जब धर्म की हानि होती है और पापी घमण्डी दैत्य बढ़ते हैं ॥३॥

करहिँ अनीति जाइ नहिँ बरनी । सीदहिँ बिप्र-धेनु-सुर-धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥४॥

वे अनीति करते हैं जो कही नहीं जा सकती, ब्राह्मण, गैया, पृथ्वी, और देवता दुखी होते हैं। तब तब कृपानिधान प्रभु रामचन्द्रजी नाना प्रकार के शरीर धारण करके सज्जनों की पीड़ा हरते हैं ॥४॥

दो॰—असुर मारि थापहिँ सुरन्ह, राखहिँ निज-खुति-सेतु।
जग बिस्तारहिँ विसद जस, राम-जनम कर हेतु ॥१२१॥

दैत्यों को मार कर देवताओं को स्थापन कर प्रधानतः वेध की मर्यादा की रक्षा करते हैं। जगत् में अपना निर्मल यश फैलाते हैं, रामचन्द्रजी के जन्म का कारण यही है ॥१२१॥