सत-सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥
बिस्व-मोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूप निहारी ॥२॥
उसके ऐश्वर्य का विलास सौ इन्द्र के बराबर है, वह रूप, तेज, बल और नीति का स्थान है। विश्वमोहनी उसकी कन्या है, जिसकी सुन्दर छवि देख कर लक्ष्मी मोहित हो जाती हैं ॥२॥
सोइ हरि माया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥
करइ स्वयम्बर से नप-बाला। आये तहँ अगनित महिपाला ॥३॥
वही सब गुणों की खान भगवान् की माया है, क्या उसकी शोभा बखानी जा सकती है? (कदापि नहीं)। वह राजकन्या स्वयम्बर करती है, वहाँ असंख्यो राजा आये हुए हैं ॥३॥
मुनि कौतुकी नगर तेहि गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥
सुनि सब चरित भूप गृह आये। करि पूजा नृप मुनि बैठाये ॥४॥
खेलवाड़ी मुनि उस नगर में गये और पुरवासियों से पूछा, सारा चरित सुनकर राजमन्दिर में आये, राजा ने मुनि को सत्कार कर के बैठाया ॥४॥
दो॰—आनि देखाई नारदहि, भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब, एहि के हृदय बिचारि ॥१३०॥
राजा ने राजकुमारी को लाकर नारद को दिखाया और कहा—हे नाथ! हृदय में विचार कर इसके गुण-दोष सब कहिए ॥१३०॥
चौ॰—देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदय हरष नहिँ प्रगट बखाने ॥१॥
उसके रूप को देख कर मुनि वैराग्य भुला कर बड़ी देर तक देखते रहे। उसके लक्षणों को निहार कर अपने को भूल गये, मन में प्रसन्न हुए; किन्तु उसे प्रकट नहीं कहा ॥१॥
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समर भूमि तेहि जीत न कोई॥
सेवहिँ सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥२॥
जो इसे व्याहेगा, वह अमर होगा और उसको कोई रणभूमि में न जीत सकेगा। शीलनिधि की कुमारी जिसको अपना वर बनावेगी, समस्त जड़चेतन उसकी सेवा करेंगे ॥२॥
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक धनाइ भूप सल भाखे॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीँ। नारद चले सोच मन माहीँ ॥३॥
सब लक्षण विचार कर हृदय में रख लिया, कुछ एक बना कर राजा से कहा। लड़की सुन्दर लक्षणवाली है। यह कह कर नारद राजा के पास से चले, उनके मन में सोच उत्पन्न हुआ ॥३॥