कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिँ कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि-बिरह तुम्ह होब दुखारी ॥४॥
तुमने हमारा चेहरा बन्दर का कर दिया, वे ही बन्दर तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरी बड़ी हानि (बुराई) की, इसलिये तुम स्त्री के वियोग से दुखी होगे ॥४॥
दो॰—साप सीस धरि हरषि हिय, प्रभु बहु बिनती कीन्ह।
निज-माया के प्रबलता, करषि कृपानिधि लीन्ह ॥१३७॥
प्रसन्न मन से शाप शिरोधार्य करके प्रभु ने बहुत बिनती की। कृपानिधान भगवान् ने अपनी माया की जोरावरी खींच ली ॥१३७॥
चौ॰—जब हरि माया दूरि निवारी। नहिँ तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि-चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥१॥
जब भगवान् ने माया दूर कर दी, वहाँ न लक्ष्मी हैं न राजकुमारी, तब मुनि अत्यन्त भयभीत हो वैकुण्ठनाथ के चरणों को पकड़ लिया और बोले कि—हे शरणागतों के दुःख हरनेवाले महराज! मेरी रक्षा कीजिए ॥१॥
अपने दुष्कृत्य को समझ कर सहसा नारदजी के मन में भय से चित्तविक्षेप होना कि अरे! मैं ने घोर अनर्थ किया, 'त्रास संचारीभाव' है।
मृषा होउ मम साप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥
मैँ दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहि किमि मेरे ॥२॥
हे कृपालु! मेरा शाप झूठ हो जाय, दीनदयाल भगवान् ने कहा—ऐसी हमारी इच्छा है (वह असत्य न होगा)। मुनि ने कहा—स्वामिन्! मैंने आपको बहुतेरे दुर्वचन कहे, मेरे वे पाप कैसे मिटेंगे ॥२॥
जपहु जाइ सङ्कर सत-नामा। होइहि हृदय तुरत बिस्रामा।
कोउ नहिँ सिव समान प्रिय मोरे। असि परतीति तजहु जनि भाेरे ॥३॥
भगवान् ने कहा—जाकर शङ्करजी का सत् (श्रेष्ठ) नाम जपिये, तुरन्त हृदय में शान्ति होगी। शिवजी के समान मेरा कोई प्रिव नहीं हैं। ऐसा विश्वास भूल कर भी न छोड़ना ॥३॥
इन वाक्यों से यह श्वनि व्यज्जित होती है कि तुमने शिवजी की बात पर विश्वास न करके बड़ी भूल की, इसी से क्लेश भोगना पड़ा। अब कभी ऐसी भूल न करना।
जेहि पर कृपा न करहिँ पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहिँ माया नियराई ॥४॥
हे मुनि! जिस पर शिव की दया नहीं करते, वह हमारी भक्ति नहीं पाता, ऐसा हृदय रखकर जाओ धरती पर विचरण करो। अब माया तुम्हारे समीप न आवेगी ॥४॥
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