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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/२१०

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प्रथम सोपान, बालकाण्डे।


परम प्रभु की मानमर्यादा के कारण राजा के मन में सङ्कोच उत्पन्न हुआ कि स्वामी को पुत्र होने के लिए कैसे कहूँ, इससे आप के समान कहना 'नीडा सञ्चारीभाव' है।

चौ॰—देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥
आपु सरिस खोजउँ कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैँ आई ॥१॥

राजा की प्रीति देख कर और उनके अमूल्य वचन सुन कर कृपानिधान भगवान् बोले—हे राजन्! अपने बराबर कहाँ खोजने जाऊँ, इसलिए मैं ही आ कर तुम्हारा पुत्र हाऊँगा ॥१॥

'अपने बराबर कहाँ खोजने जाऊँ' इस वाक्य में लक्षणामूलक गूढ़ व्यङ्ग है कि ब्रह्माण्ड में मेरी बराबरी का कोई नहीं है, इससे मैं पुत्र होऊँगा।

सतरूपहि बिलोकि कर जोरे। देबि माँगु बर जो रुचि ताेरे॥
जो बर नाथ चतुर नृप माँगा। सोइ कृपाल माेहि अति प्रिय लागा ॥२॥

शतरूपा को हाथ जोड़े हुए देख कर भगवान बोले—हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो। रानी ने कहा—हे नाथ, कृपा के स्थान! चतुर राजा ने जो वर माँगा; वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा है।

प्रभु परन्तु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत-हित तुम्हहिँ सुहाई॥
तुम्ह ब्रह्मादि-जनक जग खामी। ब्रह्म सकल-उर-अन्तरजामी ॥३॥

परन्तु हे प्रभो! यद्यपि भक्तों का कल्याण करना आप को सुहाता है, तो भी मुझ से बड़ी ढिठाई होती है (क्षमा कीजिए)। आप ब्रह्मा श्रादि देवों को उत्पन्न करनेवाले, जगत् के स्वामी, परब्रह्म और सब के हृदय की बात जाननेवाले हैं ॥३॥

अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रबान पुनि साेई॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीँ। जो सुख पावहिँ जो गति लहहीँ ॥४॥

ऐसा समझते मन में सन्देह होता है, फिर जो स्वामी ने कहा वह निश्चय ही (अवश्यम्भावी) है। हे नाथ! आपके जो अनन्यभक्त (ख़ास दास) हैं, वे जो सुख और जो गति पाते हैं ॥४॥

दो॰—साेइ-सुख साेइ-गति साेइ-भगति, सोइ निज चरन-सनेहु।
साेइ-बिबेक साइ-रहनि प्रभु, हमहिँ कृपा करि देहु ॥१५०॥

हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, अपने चरणों में स्नेह, वही ज्ञान और वही रीति कृपा कर के हमें दीजिए ॥१५०॥

चौ॰—सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बच रचना। कृपासिन्धु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीँ। मैँ साे दीन्ह सब संसय नाहीँ ॥१॥

सुन्दर, कोमल और अभिप्राय-गर्भित वचनों की रचना सुन कर कृपा-सागर हरि मधुर बचन बोले। जो तुम्हारे मन की अभिलाषाएँ हैं, वह सब मैं ने दी, इसमें सन्देह नहीं ॥१॥