बड़े सनेह लघुनह पर करहौँ। गिरि निज सिरन्हि सदा तृन धरहीँ॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। सन्तत धरनि धरत सिर रेनू ॥४॥
बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते हैं, पर्वत अपने सिरों (शिखरों) पर सदा घास को धारण करते हैं। अथाह समुद्र के माथे पर फेन बहता है और धूलि को पृथ्वी निरन्तर अपने सिर पर रखती है ॥४॥
दो॰—अस कहि गहे नरेस पद, स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिय प्रभु, सज्जन दीनदयाल ॥१६७॥
ऐसा कह कर राजा ने पाँव पकड़ लिया और बोले—हे स्वामी! कृपा कीजिये। प्रभो! आप सज्जन और दीनों पर दया करनेवाले हैं, मेरे लिए दुःख सहिए ॥१६७॥
चौ॰—जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट-प्रबीना।
सत्य कहउँ भूपति सुनु ताेही। जग नाहिँ न दुर्लभ कछु माेही ॥१॥
राजा को अपने अधीन जान कर वह छल में प्रवीण तपस्वी बोला—है राजन्! सुनो, मैं तुझ से साय कहता हूँ कि जगत् में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥१॥
अवसि काज मैँ करिहउँ ताेरा। मन क्रम बचन भगत तैँ मारा।
जोग-जुगुति तप मन्त्र प्रभाऊ। फलइ तबहिँ जब करिय दुराऊ ॥२॥
मैं अवश्य ही तेरा कार्य करूँगा, क्योकि तू मन, कर्म और वचन से मेरा भक्त है योग की युक्ति, तपस्या और मन्त्रों के प्रभाव तभी फलीभूत होते हैं जब छिपा कर किये जाते हैं ॥२॥
जौँ नरेस मैँ करउँ रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जाइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥३॥
हे राजन्! यदि मैं रसोई करूँ और तुम परोसाे, पर मुझे कोई न जाने। उस अन्न को जो जो भोजन करेगा, वही वही तुम्हारी आज्ञा के अनुसार चलेगा ॥३॥
जैसे उसका रसोई बनाना असत् है, तैसे ब्राह्मणों का वश होना मिथ्या है। असत् से असत् की समता का भावसूचक 'प्रथम निदर्शना अलंकार' है।
पुनि तिन्ह के गृह जेवइँ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। सम्बत भरि सङ्कलप करेहू ॥४॥
फिर उन के घर जो कोई भोजन करेगा, हे राजन्! सुनाे, वह भी तुम्हारे वश में हो जायगा। नृपाल! तुम जा कर यही उपाय करो और साल भर के लिए सङ्कलप करना ॥४॥