चौ॰—अस कहि सब महिदेव सिधाये। समाचार पुरबासिन्ह पाये॥
सोचहिँ दूषन दैवहिँ देहीँ। बिरचत हंस काग किय जेहीँ ॥१॥
ऐसा कह कर सब ब्राह्मण चले गये, यह समाचार नगरवासियों ने सुना। वे चिन्ता कर के विधाता को दोष देते हैं, जिसने राजहंस बनाते हुए कौआ कर दिया ॥१॥
प्रस्तुत वृत्तान्त तो राजा भानुप्रताप को दूषण देना है कि जिन्होंने अपार सत्कर्म कर भगवान् को अर्पण किया; किन्तु कभी किसी फल की इच्छा मन में नहीं ले आये। उन्होंने कपटी-मुनि से ऐसा असम्भव वर माँगा जिससे अपना सर्वनाश ही कर डाला, इसे न कह कर विधाता को दोष देना कि हंस से कौना बनाया 'ललित अलंकार' है
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहि खल जहँ तहँ पत्र पठाये। सजि सजि सेन भूप सब आये ॥२॥
पुरोहित को घर पहुँचा कर राक्षस ने तपस्वी को ख़बर दिया। उस दुष्ट ने जहाँ तहाँ पत्र भेजा, सब राजा सेना सज सज कर चढ़ आये ॥२॥
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बन्धु समेत परेउ नृप धरनी ॥३॥
डङ्का बजा कर नगर घेर लिया, अनेक प्रकार की लड़ाई नित्य होने लगी। सब शूरवीर को करनी कर वे जूझ गये, भाई के सहित राजा मानुप्रताप धरती पर कट पड़े ॥३॥
सत्यकेतु-कुल कोउ नहिँ बाचा। बिप्र-साप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज-पुर गवने जय जस पाई ॥४॥
सत्यकेतु के वंश में कोई भी नहीं बचा, ब्राह्मणों का शाप झूठ कैसे हो सकता है? सक राजाओं ने शत्रु को जीत कर नगर बसाया और विजय-यश पा कर अपनी राजधानी को चले गये ॥४॥
दो॰—भरद्वाज सुनु जाहि जत्ब, हाेइ बिधाता बाम।
धूरि मेरु सम जनक जम, ताहि ब्याल सम दाम ॥१७५॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—हे भरद्वाज सुनिए, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसे धूलि सुमेरु-पर्वत के समान, पिता यमराज के तुल्य और रस्सी साँप के बराबर हो जाती है ॥१७५॥
चौ॰—काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।
दस-सिर ताहि बीस-भुजदंडा। रावन नाम बोर बरिवंडा ॥१॥
हे मुनि! सुनिए, समय पाकर वह राजा अपने समाज सहित गतस हुआ, उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं, रावण नाम बड़ा बलवान् सुभट हुआ ॥१॥