दो॰—कौसल्यादि नारि प्रिय, सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़, हरि-पद-कमल विनीत ॥१८८॥
कौशल्या आदि उनकी प्यारी सब स्त्रियाँ पवित्र आवरणवाली, पति की आज्ञा में नम्रता पूर्वक तत्पर और भगवान् के चरण-कमलों में स्थायी प्रेम रखती थीं ॥१८८॥
चौ॰—एक बार भूपति मनमाहीँ। भइ गलानि मारे सुत नाहीँ॥
गुरु गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि विनय बिसाला ॥१॥
एक बार राजा के मन में ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरन्त गुरु के घर गये और पाँव पकड़ कर बड़ी प्रार्थना की ॥१॥
इतने साम्राज्य का भोगनेवाला कोई नहीं, बिना पुत्र के सब व्यर्थ है। यह सोच कर मन में सन्ताप होना 'ग्लानि सञ्चारीभाव' है।
निज दुख सुख सब गुरुहि सुनायो। कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायो॥
धरहु धीर होइहहिँ सुत-चारी। त्रिभुवन-विदित भगत-भय-हारी ॥२॥
अपना दुःख सुख सब गुरुजी को सुनाया, वशिष्ठजी ने बहुत तरह से कह कर समझाया कि धीरज धरिए, आप के चार पुत्र तीनों लोक में प्रसिद्ध और भक्तों के भय को हरनेवाले होंगे ॥२॥
इच्छा से राजा गुरु के पास गये, वहाँ चार पुत्रों का वर पाना अर्थात् चित चाही बात से अधिक अर्थ सिद्ध होना 'द्वितीय प्रहर्पण अलंकार' है।
सृङ्गी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हे। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हे ॥३॥
वशिष्ठजी ने शृङ्गीऋषि को बुलवाया और कल्याण के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ कराया। मुनि ने भक्ति के सहित आहुति दी, (मन्त्र पढ़ कर दृश्य को अग्नि में हवन करना) अग्निदेव हाथ में हविष्यान्न लिये प्रकट हुए ॥३॥
जो वसिष्ठ कछु हृदय विचारा। सकल काज भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। यथा जोग जेहि भाग बनाई ॥४॥
उन्होंने कहा—हे राजन्! वशिष्ठजी ने जो कुछ मन में विचारा है, बार का यह समूर्ण कार्य सिद्ध हो गया। यह हव्यान्न ले जाकर और यथायोग्य (चार) भाग बना कर रानियों को वाँट दीजिए ॥४॥
दो॰—तब अद्वस्य भये पावक, सकल समहि समुझाइ।
परमानन्द मगन नृप, हरष न हृदय समाइ ॥१८९॥
सारी सभा को समझा कर तब अग्निदेव अन्तर्धान हो गये। राजा परम आनन्द मैं मग्न हुए, उनके हृदय में हर्ष अमाता नहीं (बाहर को उमड़ा पड़ता) है ॥१८९॥