लोचन अभिरामं, तनु-धन-स्यामं, निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभा-सिन्धु खरारी ॥७॥
कौशल्याजी के हितकारी, दीनों पर दया करनेवाले कृपालु भगवान् प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरनेवाले उनका अद्भुत रूप विचार कर माता आनन्दित हुईं। नेत्रों को आनन्द देनेवाले श्याम मेघ के समान शरीर है और चारों भुजाओं में अपने हथियार ( शंख, चक्र, गदा, पद्म) धारण किए हैं। खर राक्षस के बैरी, शोभा के समुद्र, विशाल नेनवाले हैं, अङ्गों में आभूषण और गले में वनमाला शोभायमान है॥७॥
कह दुइ कर जोरा, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करउँ अनन्ता।
माया-गुन-ज्ञाना,-तीत अमाना, बेद पुरान भनन्ता॥
करुना-सुख-सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिँ स्त्रुति सन्ता।
सो मम-हित-लागी, जन-अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकन्ता ॥८॥
दोना हाथ जोड़ कर कहती हैं, हे अनन्त भगवान्! मैं आप की प्रशंसा किस प्रकार से करूँ। वेद पुराण कहते हैं कि आप माया, गुण, ज्ञान से परे और परिमाण रहित हैं। जिनको श्रुतियाँ और सन्तलोग दया-सुख के समुद्र एवम् सब गुणों के स्थान कह कर गाते हैं, वे हो लक्ष्मीकान्त भक्तों पर प्रेम करनेवाले, मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं ॥८॥
त्रिभंगी-छन्द।
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित-माया, रोम रोम प्रति, बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति, थिर न रहै॥
उपजा जब ज्ञाना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि, कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुन, प्रेम लहै ॥१॥
वेद कहते है कि माया से रचे हुए अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड आप के रोम रोम में बसते है, वे ही मेरे गर्भ में रहे? यह हँसी (निन्दा ) की बात सुन कर धीरवानों की बुद्धि स्थिर नहीं रह सकती। जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ देखा; तब प्रभु रामचन्द्रजी मुस्कुराये, वे बहुत तरह के चरित्र करना चाहते हैं। पूर्वजन्म की सुन्दर कथा कह कर माता को समझाया, जिस प्रकार उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो ॥१॥
अत्यन्त लघु आधार रोम में, बहुत बड़े आधेय कोटि कोटि ब्रह्माण्ड को रखना 'द्वितीय अधिक अलंकार' है।
चवपैया-छन्द।
माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा।
कीजिय सिसुलीला, अति प्रिय-सोला, यह सुख परम अनूपा॥
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