सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/२४९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१९४
रामचरित-मानस।

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, हाइ बालक सुर-भूपा॥
यह चरित जे गावहिँ, हरि पद पावहिँ, ते न परहिँ भव-कूपा ॥९॥

माता की वह बुद्धि बदल गई फिर वे बोली—हे तात! इस रूप को त्याग दीजिए। अत्यन्त प्रिय को हद बाललीला कीजिए, यह सुख बड़ा ही अनुपम है। देवताओं के राजा सुजांन प्रभु माता के वचन सुन कर बालक होकर रोने लगे। जो इस चरित्र को गाते हैं वे संसार-कूप में नहीं पड़ते, परम-पद पाते हैं ॥९॥

'ठाना' शब्द से लक्ष्यक्रम विवक्षितवाच्य ध्वनि है। जिसमें राजमहल और नगर निवासियों को बालकाेत्पत्ति की एक साथ ही सूचना जाय।

दो॰—बिप्र-धेनु-सुर-सन्त हित, लीन्ह मनुज-अवतार।
निज-इच्छा निर्मित-तनु, माया-गुन-गो पार ॥१९२॥

ब्राह्मण, गैया, देवता और सज्जनों के हित मनुष्य-अवतार लिया। जो परमात्मा माया, गुण तथा इन्द्रियों से परे हैं उन्होंने अपनी इच्छा से शरीर निर्माण किया है ॥१९२॥

चौ॰—सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। सम्भ्रम चलि ओई सब रानी।
हरषित जहँ तहँ धाईँ दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी ॥१॥

बालक के रुदन का अतिशय प्रिय शब्द सुन कर सब रानियाँ तुरन्त (प्रसव-भवन में) चल कर आईं। दासियाँ जहाँ तहाँ से प्रसन्न होकर दौड़ी और सम्पूर्ण नगर-निवासी आनन्द में मग्न हो गये ॥१॥

बालक का रोना सुनते ही सारे महल की रानियाँ, दासियों और नगर निवासी सब साथ ही आनन्द में मग्न हो गये 'अक्रमातिशयोक्ति अलंकार' है।

दसरथ पुत्र-जन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानन्द समाना॥
परम-प्रेम-मन पुलक-सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा ॥२॥

दशरथजी पुत्र-जन्म कान से सुन कर ऐसे प्रसन्न हुए, मानों वे ब्रह्म के सुख में समा गये है। मन में बड़ा प्रेम हुआ, शरीर पुलकित हो गया, उठना चाहते हैं (पर उठ नहीं सकते, इसलिए) बुद्धि को सावधान करते हैं ॥२॥

जा कर नाम सुनत सुभ होई। माेरे गृह आवा प्रभु साेई।
परमानन्द-पूरि-मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥३॥

जिनका नाम सुनने से कल्याण होता है, वे ही प्रभु मेरे घर आये हैं। परम आनन्द से राजा का मन भर गया, बाजावालों को बुलवा कर बाजा बजाने के लिए कहा ॥३॥

गुरु बसिष्ट कहें गयउ हँकारा। आये द्विजन्ह सहित नृप-द्वारा॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप-रासि गुन कहि न सिराई ॥४॥

गुरु वशिष्ठजी को बुलौआ गया, वे ब्राह्मणों के सहित राजद्वार पर आये। जा कर अनुपम बालक को देखा, जो छवि की राशि हैं और जिनका गुण कहने से समाप्त नहीं हो सकता ॥४॥