दो॰—मास दिवस कर दिवस भा, मरम न जानइ कोइ।
रथ समेत रवि थाकेउ, निसा कवनि विधि होइ ॥१९५॥
महीने दिन का एक दिन हुआ, पर इसका भेद कोई नहीं जानता। रथ के सहित सूर्य भगवान् ठहर गये फिर रात किस प्रकार हो? ॥१९५॥
चौ॰—यह रहस्य काहू नहिँ जाना। दिन-मनि चले करत गुन गाना॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा ॥१॥
इस गुप्तभेद को किसी ने नहीं जाना, सूर्यदेव गुण गान करते हुए चले। यह जन्ममहोत्सव देख कर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्य की बड़ाई करते घर को चले ॥१॥
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनुगिरिजा अति दुढ़ मति ताेरी॥
काकभुसुंडि सङ्ग हम दोऊ। मनुज-रूप जानइ नहिँ कोऊ ॥२॥
शिवजी कहते हैं—हे गिरिजा! सुनो, तुम्हारी बुद्धि बड़ी पक्की है इसलिए एक और भी मैं अपनी चोरी कहता हूँ। हम और कागभुशुण्ड दोनों साथ ही मनुष्य रूप में थे, जिसको कोई नहीं जानता था ॥२॥
परमानन्द प्रेम-सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिँ मगन मन भूले॥
यह सुभ चरित जान पै साेई। कृपा राम कै जा पर होई ॥३॥
प्रेम सुख से परम आनन्द में प्रफुल्लित मन में मग्न गलियों में फिरते थे। पर यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिस पर रामचन्द्रजी की कृपा होती है ॥३॥
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नाना बिधि चीरा ॥४॥
उस समय जो जिस प्रकार आया, जिसके मन में जो अच्छा लगा राजा ने वही दिया। हाथी, रथ, घोड़े, सुवर्ण, गैया, हीरा और नाना भाँति के वस्त्र राजा ने दिये ॥४॥
दो॰—मन सन्तोष सबन्हि के, जहँ तहँ देहिँ असीस।
सकल तनय चिरजीवहु, तुलसिदास के ईस ॥१९६॥
सभी के मन सन्तुष्ट हुए जहाँ तहाँ आशीर्वाद देते हैं कि तुलसीदास के स्वामी सब पुत्र चिरंजीवी है॥१९६॥
चौ॰—छुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिय दिन अरु राता।
नाम-करन कर अवसर जानी। भूप बोलि पठये मुनि-ज्ञानी ॥१॥
इसी तरह कुछ दिन बीत गये, दिन और रात जाते मोलुप न हुआ। नाम रखने का समय जान कर राजा ने ज्ञाना-मुनि (वशिष्ठजी) को बुलवा भेजा ॥१॥
नामकरण-हिन्दुओं के सोलह संस्कारों में से एक जिसमें बालक का नाम रक्खा जाता है।