अति प्रेम अधीरा, पुलक-सरीरा, मुख नहिँ आवइ, बचन कही।
अतिसय बड़भागी, चरनन्हि लागी, जुगल नयन जल,-धार बही ॥२॥
शोक के नाशनेवाले पवित्र चरणों के छूते ही स्वच्छ तप की राशि प्रकट हुई। भक्तों के सुखदाता रघुनाथजी को देखते हुए सामने हाथ जोड़ कर खड़ी रही। अत्यन्त प्रेम में विह्वल होने से शरीर पुलकित हो गया, मुँहसे बात नहीं कही जाती है। वड़ी ही भाग्यवती है,चरणों। में लिपट गयी और दोनों आँखों से आँसुओं की धारा बह चली ॥२॥
ईश्वर विपयक अनुपम प्रेम रतिभाव है। रामचन्द्रजी के दर्शन से रोमाञ्च, स्वरमङ्ग अनु आदि सात्विक अनुभावों और हर्ष, चपलतादि सञ्चारी भावों द्वारा पूर्णावस्था को प्राप्त हुआ है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु कहँ चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
अति निर्मल बानी, अस्तुति ठानी, ज्ञान-गम्य जय, रघुराई॥
मैं नारि अपावन, प्रभु जग-पावन, रावन-रिपु जन,-सुखदाई।
राजीव-बिलोचन, भव-भय-मोचन, पाहि पाहि सरनहिँ आई ॥३॥
मन में धीरज करके स्वामी को पहचाना और रघुनाथजी की कृपा से भक्ति पाई। अत्यन्त निर्मल वाणी से स्तुति करने लगी कि हे रघुनाथजी। ज्ञान से जानने योग्य भाप की जय हो; मैं अपाचन स्त्री हूँ और आप जगत को पवित्रकरनेवाले हैं, रावण के वैरी तथा भक्तजनों को आनन्द देनेवाले हैं। हे कमल नयन, संसारी भय को छुड़ानेवाले! आपकी शरण आई हूँ मेरी रक्षा कीजिए, राक्षा कीजिए ॥३॥
मैं अपवित्र व्यभिचारिणी स्त्री हूँ और आप जगत के पावन करनेवाले, यथायोग्य का सङ्ग वर्णन 'प्रथम सम अलङ्कार' है।
मुनि साप जो दीन्हा, अति भल कीन्हा, परम अनुग्रह, मैँ माना।
देखेउँ भरि लोचन, हरि भव-मोचन, इहइ लाभ सङ्कर जाना॥
बिनती प्रभु माेरी, मैं मति भारी, नाथ न बर माँगउँ आना।
पद-कमल-परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करइ पाना ॥४॥
मुनि ने जो शाप दिया यह बहुत ही अच्छा किया, उसको मैं उनकी बड़ी कृपा मानती हुँ। जिससे संसारी भय छुड़ानेवाले भगवान् को मैंने आँख भर देखा, इसी (दर्शन) को शङ्करजी लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की भोली हूँ, मेरी यही प्रार्थना है, स्वामिन्! मैं दूसरा वर नहीं माँगती हूँ। आप के चरण-कमलों की रज के प्रेम रूपी मकरन्द (पुष्प-रस) को मेरा मन रूपी भ्रमर सदा पान करे ॥४॥
गौतम ऋषि के शाप रुपी दोष को रामचन्द्रजी के दर्शन के कारण गुण मानमा 'अनुज्ञा अलङ्कार' है।