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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/२९२

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प्रथम सोपान, बालकाण्ड।

भाल तिलक स्त्रम-बिन्दु सुहाये। स्त्रवन सुभग भूषन छबि छाये॥
बिकट भृकुटि कच घूघुरबारे। नव-सरोज लोचन रतनारे ॥२॥

माथे पर तिलक और पसीने की बूँदें सुहा रही हैं और कानों में सुन्दर भूषणों की छवि छाई हुई है। टेढ़ी भौहे, धूँघरवाले बाल और नवीन कमल के समान लाल नेत्र हैं ॥२॥

चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मन मोला॥
मुख-छबि कहि न जाइ माेहि पाहीँ। जो बिलोकि बहु काम लजाहीँ ॥३॥

ठुड्डी, नाक और गाल मनोहर हैं, मुस्कुराने का श्रानन्द मन को मोल ले लेता है। मुख की शोभा मुझ से कही नहीं जाती, जिसे देख कर बहुत से काम लजा जाते हैं ॥३॥

पूर्वार्द्ध में-गम्योत्प्रेक्षा है। क्योंकि हास-विलास (मानों) मन को मोल लेता हो, बिना वाचक पद के उत्प्रेक्षा की गई है। उत्तरार्द्ध में उपमेय की बराबरी में उपमान का व्यर्थ होना 'पञ्चम प्रतीप अलंकार' है।

उर-मनि-माल कम्बु कल ग्रीवाँ। काम-कलम-कर भुज बल सीवाँ॥
सुमन समेत बाम कर दोना। साँवर कुँवर सखी सुठि लाेना ॥४॥

हृदय में मणियों की माला और शङ्ख के समान सुन्दर गला है, कामदेव रूपी हाथी के बच्चे के सूँड़ के समान बल की हद भुजाएँ हैं। एक दूसरी से कहती है—हे सखी। ये श्यामल कुँअर जो बायें हाथ में फूलों सहित दोना लिए हैं, वे बड़े ही सुन्दर हैं ॥४॥

कामदेव-हाथी का सूड उत्कर्ष का कारण नहीं है, क्योंकि हाथी का सूँड़ उतार चढ़ाव होता है, यहाँ उपमा से केवल इतना ही तात्पर्य है तो भी काम-कलम कर की कल्पना करना 'प्रौढोक्ति अलंकार' है।

दो॰—केहरि-कटि पट-पीत-धर, सुखमा-सीलनिधान।
देखि भानुकुलभूषनहिँ, बिसरा सखिन्ह अपान ॥२३३॥

सिंह के समान पतली कमर, पीताम्बर पहने हुए, शोभा और शील के भण्डार हैं। सूर्याकुल के भूषण को देख कर सस्त्रियाँ अपनी सुध भूल गई ॥२३३॥

यहाँ सम्पूर्ण सखियों को अपनी सुध भूल जाना और चेष्टा रहित होना 'प्रलय सात्विक अनुभाव' है।

चौ॰—धरि धीरज,एक आलि सयानी। सीता सन बाली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान धरेहू। भूप-किसोर देखि किन लेहू ॥१॥

एक चतुर सखो धीरज धर कर सीताजी से उनका हाथ थाम कर बोली—पार्वतीजी का ध्यान फिर धरना, राजकुमार को क्यों नहीं देख लेती हो? ॥१॥

सीताजी का रामचन्द्रजी के प्रेम में मग्न होना, इस प्रकट वृत्तान्त को छिपाने की इच्छा से पार्वतीजी के ध्यान के बहाने सचेत करना 'व्यजोक्ति अलंकार' है। बोधव्य जानकी