चौ॰—प्रभुहि देखि सब नुप हिय हारे। जनु राकेस उदय भये तारे॥
अस प्रतीति सब के मन माहीँ। राम चाप ताेरब सक नाहीँ ॥१॥
प्रभु रामचन्द्रजी को देख कर सब राजा हृदय में हार गये, वे ऐसे मालूम होते हैं मानों चन्द्रमा के उगने पर तारागण हों। सब के मन में ऐसा विश्वास हो रहा है कि रामचन्द्रजी धनुष तोड़ेगे इसमें सन्देह नहीं ॥१॥
चन्द्रमा के उदय से तारागणें की ज्योति मन्द होती ही है। यह 'उक्तविषया वस्तूस्प्रेक्षा अलंकार' है। रघुनाथजी की शूरता की ऐड़ और प्रताप को देख कर अनुमान से यह निश्चय करना कि ये निस्तदेह धनुष तोड़ेंगे, 'अनुमान प्रमाण अलंकार' है।
बिनु भब्जेहु अव-धनुष विसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जस प्रताप बल तेज गँवाई ॥२॥
विशाल शिव-धनुष को बिना तोड़े ही सीताजी रामचन्द्र के हदय में जयमाल पहिनावेगी। हे भाई! ऐसा विचार कर यश, प्रताप, बल और तेज खो कर अपने अपने घर। जाते जाओ ॥२॥
यश, प्रताप, बल और तेज अनेक उपमेयों का एक धर्म "गँवाना वर्णन 'प्रथम तुल्ययोगिता अलंकार' है।
बिहँसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अन्ध अभिमानी॥
ताेरेहु धनुष ब्याह अवगाहा। बिनु ताेरे को कुँवरि बियाहा ॥३॥
दूसरे राजा जो अज्ञान से अन्धे और घमण्डी हैं, वे इस बात को सुन कर हँसे। उन्होंने कहा—धनुष तोड़ने पर विवाह होना कठिन है, फिर बिना तोड़े कुमारी को कौन ब्याहेगा? ॥३॥
रामचन्द्रजी का उत्कर्ष' धमण्डी राजाओं को असहन होना और दर्द भरी बाते कहना 'असूया सज्चारी भाव' है।
एक बार कालहु किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अपर भूप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने ॥४॥
एक बार काल ही क्यों न हो, सीता के निमित्त हम उसे भी लड़ाई में जीतेंगे। यह सुन कर अन्य जो धर्मात्मा, हरिभक्त और चतुर राजा हैं, वे मुस्कुराने लगे ॥४॥
मुस्कुराने में गर्वीले राजाओं के प्रति घृणा और तिरस्कार सूचक गुणीभूत व्यङ्ग है!
सो॰—सीय बियाहब राम, गरब दूरि करि नृपन्ह को।
जीति को सक सङ्ग्राम, दसरथ के रन-बाँकुरे ॥२४५॥
साधुराजा बोले—राजाओं के गर्व को दूर कर के रामचन्द्रजी सीताजी को विवाहेंगे। भला! दशरथजी के रणबाँके पुत्रों को युद्ध में कौन जीत सकता है? ॥२४५॥