दो॰—कुँअरि मनोहर बिजय बड़ि, कीरति अति-कमनीय।
पावनिहार बिरञ्चि जनु, रचेउ न धनु-दमनीय॥२५१॥
सुन्दर कुँवरि, बड़ी विजय और अतिशय रमणीय कीर्त्ति का पानेवाला वही होगा जो धनुष को तोड़ेगा। पर मुझे ऐसा मालूम होता है कि विधाता ने धनुष को काबू में करने वाला किसी को बनाया ही न हो॥२५१॥
राजा कुँवरि को मनोहर कहने में कन्या का शृङ्गार वर्णन कह कर कुछ लोग आक्षेप करते हैं। राजा ने शृङ्गार तो वर्णन नहीं किया 'सुन्दर कन्या' कहना शृङ्गार कथन कैसे कहा जायगा? यह साधारण बोलवाल की भाषा है।
चौ॰—कहहु काहि यह लाभ न भावा। काहुन सङ्कर-चाप चढ़ावा॥
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिल भर भूमि न सकेउ छुड़ाई॥१॥}}
कहिए तो, यह लाभ किस को अच्छा नहीं लगा जो किसी ने शङ्कर-चाप को नहीं चढ़ाया? भाइयो! चढ़ाना और तोड़ना दूर रहे, आप लोग तिल भर धरती नहीं छुड़ा सके॥१॥
शिव-धनु को उठाने और तोड़ने की सब राजाओं को प्रबल उत्कण्ठा थी, इस सही बात को राजा का नहीं कर जाना 'काकुक्षिप्त गुणीभूत व्यङ्ग' है।
अब जनि कोउ माखइ भट मानी। बीर-बिहीन मही मैं जानी॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥२॥
अब कोई सम्मान चाहनेवाला योद्धा नाराज़ न हो, मैंने धरती बिना वीर की समझ ली। आप लोग आसरा छोड़ कर अपने अपने घर जाइए, विधाता ने वैदेही का विवाह नहीं लिखा (दैवयोग पर वश नहीं)॥२॥
सुकृत जाइ जौँ पन परिहरऊँ। कुँअरि कुँआरि रहउ का करऊँ॥
जौँ जनतेउँ बिनु भट भुँइ भाई। तौ पन करि होतेउँ न हँसाई॥३॥
यदि प्रतिज्ञा को छोड़ता हूँ तो सुकृत चला जाता है, कुमारी कुमारी रह जाय तो मैं क्या कर सकता हूँ? जो जानता कि हे भई! पृथ्वी बिना वीर की हुई है तो हँसने योग्य प्रण कर के दिल्लगी के योग्य न बनता॥३॥
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भये दुखारी॥
माखे लखन कुटिल भइ भौंहैं। रद-पट फरकत नयन रिसौहेँ॥४॥
जनकजी के वचन सुन कर और जानकीजी को देख कर सब स्त्री-पुरुष दुखी हुए। लक्ष्मण जी क्रोधित हो गये, भौहें टेढ़ी हो गई, ओंठ फड़कने लगे और आँख गुस्से से लाल हो गई॥४॥