सचिव समय सिख देइ न कोई। बुध-समाज बड़ अनुचित होई॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदु-गात-किसोरा॥२॥
कोई मन्त्री डर से शिक्षा नहीं देते हैं, विद्वन्मण्डली में यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ धनुष की कठोरता को वज्र भी चाहता है और कहाँ श्यामल कोमल अङ्ग किशोर अवस्था के राजकुमार!॥२॥
बिधि केहि भाँति धरउँ उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिय हीरा॥
सकल सभा के मति भइ भोरी। अब मोहि सम्भुचाप गति तोरी॥३॥
हे विधाता। किस तरह मन में धीरज धरूँ, कहीं सिरस के फूल से हीरे की कनी छेदी जा सकती है? सारे समाज की बुद्धि भोली हुई है, अब हे शङ्कर-चाप! मुझे तेरा ही सहारा है॥३॥
सिरस के फूलों से हीरा का वेधना असम्भव है। प्रस्तुत वर्णन तो यह है कि रामचन्द्र धनुष न तोड़ सकेंगे। उसको न कह कर प्रतिबिम्ब मात्र वक्रोक्ति द्वारा कथन करना 'ललित अलंकार' है।
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअर रघुपतिहि निहारी॥
अति परिताप सीय मन माहीँ। लव निमेष जुग सय सम जाहीँ॥४॥
अपनी जड़ता (गरुआई) लोगों पर डाल कर रघुनाथजी को देख कर हलके हो जाओ। सीताजी के मन में बड़ा दुःख है, उनको एक क्षण का चौथाई भाग सैकड़ो युग के बराबर बीतता है॥४॥
जड़ धनुष से विनती करना दुःख चिन्ता से चित्त में विक्षेप होना 'मोह सञ्चारी भाव' है।
दो॰—प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लाल।
खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल॥२५॥
प्रभु रामचन्द्रजी को देख कर फिर पृथ्वी की ओर देखती, चञ्चल नेत्र शोभित हो रहे हैं। वे ऐसे मालूम होते हैं मानो चन्द्र-मण्डल हिल रहा है, उसमें दो कामदेव मछली रूपधारी खेल रहे हों॥२५८॥
जानकीजी का बार बार मुख ऊपर नीचे करना उत्प्रेक्षा का विषय है। मुख और चन्द्रमण्डल, नेत्र और मछली परस्पर उपमेय उपमान हैं। कामदेव रूपी मछली में प्रौढ़ोक्ति है। चन्द्रमण्डल में मछली रूपधारी कामदेव झूला नहीं झूलता, कवि की कल्पना मात्र 'अनुक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार' है। प्रेम रोके नहीं रुकता तब प्रभु की ओर निहारती है, गुरुजनों की लज्जा और पिता की प्रतिज्ञा का ख्याल कर धरती की ओर देखती हैं। रति, हर्ष, लाज और विषाद भाव पल पल पर उदय और विलीन हो रहे हैं।