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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/४

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द्वितीय संस्करण की प्रस्तावना।

गोस्वामी तुलसीदासजी की रामायण से बढ़ कर हिन्दीसाहित्य में दूसरा कोई अन्य नहीं है। ऐसा कौन साहित्य-सेवी होगा जो रामचरितमानस से थोड़ा बहुत परिचय न रखता हो? इसका आदर भारतवर्ष के कोने कोने में राजाधिराजों के महलों से लेकर कंगाल की झोपड़ी पर्य्यन्त है और प्रचार में तो यह वाल्मीकीय से भी कई गुना बढ़ा हुआ है। विविध मतानुयायी और भिन्न धर्मावलम्बी भी आदरणीय मान कर इसके उपदेशों से लाभ उठाते हैं। अनेक भाषाओं में अनूदित होकर यह भिन्न भिन्न देशों में सम्मान पा रहा है भारतीयों में तो कितने ही भावुक जन ऐसे होंगे जो रामचरितमानस का पाठ किये बिना जल तक नहीं ग्रहण करते। इसके ओजस्वी और मर्मस्पर्शी उपदेशों द्वारा असंख्यों स्त्री-पुरुष कुप्रवृत्तियों से छूटकर सदाचारी बन गये और बनते जाते हैं। रामभक्तों का तो यह सर्वस्व प्राणाधार ही है। इस लोकप्रसिद्ध महाकाव्य की अधिक प्रशंसा करना तो मध्याह्नकाल के सूर्य्य को हाथ में दीपक लेकर दिखाने के समान है।

यद्यपि रामायण की रचना गोसाँईजी ने अत्यन्त सीधी सादी भाषा में की है—न तो उन्होंने जटिल अर्थ लाने का प्रयत्न किया और न कठिनाई अथवा पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिये दृष्टकूट आदि को ही स्थान दिया है, उनका ध्येय तो सरलता-पूर्वक हृद्गत भावों को व्यक्त करने का जान पड़ता है—फिर भी रामायण के अर्थ की गम्भीरता इतनी अधिक है कि न जाने इस पर कितनी ही टीकाएँ हो चुकीं और होती ही जाती हैं। असंख्यों विद्वान तरह तरह की अनोखी उक्तियों से उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं, पर अन्त कोई भी नहीं लगा सका और रामचरितमानस की गूढ़ता ज्यों की त्यों बनी है। जिस प्रकार विज्ञजन अपनी मनोहर कल्पनाओं से पाठकों का मनोरञ्जन करते हैं उसी प्रकार अनभिज्ञ और प्रलापप्रिय कथक्कड़ लोग अनावश्यक अर्थों के गढ़ने में नहीं चूकते। कितने ही संशोधकों और प्रूफ़रीडरों की काटछाँट से बहुत ही पाठान्तर हो गया है तथा कुछ महाकवियों ने बीच बीच में क्षेपक और आठवाँ काण्ड जोड़ कर गोसाँईजी की त्रुटि सुधारने की उदारता प्रकट की है। किसी ने अर्द्धाली चौपाइयों को निकाल कर पिंगल की योग्यता दिखाई है और कविकृत रामायण के रूप ही को बदल डाला है। कहाँ तक कहा जाय, ऐसे ही सहस्रों विद्यावारिधियों ने रामचरितमानस में अप्रासंगिक विषयों को बलात ठूँस कर इसको खूब ही विकृत किया है जिससे मूल और क्षेपक का निर्णय करना साधारण हिन्दी जाननेवालों के लिये क्या बड़े बड़े उद्भट विद्वानों को कठिन और भ्रमोत्पादक हो गया है।

इस अनर्थकारी कार्य्य में स्वार्थलोलुप पुस्तक विक्रेताओं और प्रेसाध्यक्षों का भी हाथ है। काव्य-सौन्दर्य्य भले ही नष्टभ्रष्ट होकर गोसाँईजी के सिद्धान्तों पर पानी फिर जाय, पर इससे उन्हें प्रयोजन नहीं। उनका तो स्वार्थ सिद्ध होना चाहिये, क्योंकि क्षेपक और आठवें काण्ड के बिना बहुतेरे ग्राहक उसे खरीदना पसन्द नहीं करते। इन महाशयों ने लेखकों और टीकाकारों को प्रलोभन देकर क्षेपक मिलवाया, रामायण और इसके रचयिता की मान-मर्य्यादा की परवा न करके केवल कुछ भोलेभाले पाठकों की रुचि के लिहाज़ से और अपनी बिक्री बढ़ाने के विचार से रामचरितमानस को