(शहीद ब माफिह जलाल मकबूली बखतही) (शहीद ब माफिहताहिर इवन् खाजे दौलते कानूनगोय)
| मुहर सादुल्लाह बिन | ... | ... |
| किस्मत आनन्दराम | किस्मत कन्हई | |
| करिया करिया | करिया करिया | |
| भदैनी दो हिस्सा लहरतारा दरोबिस्त | भदैनी सेह हिस्सा शिवपुर दरोविस्त | |
| करिया | करिया | |
| नैपुरा हिस्सै टोडर तमाम | नदेसर हिस्सै टोडर तमाम | |
| करिया | अन्हरूला (अस्पष्ट) | |
| चित्तपुरा खुर्द हिस्सै टोडर तमाम |
परलोक गमन।
यह दोहा प्रसिद्ध है–
सम्वत् सोरह सौ असी, असी गङ्ग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तजे शरीर॥
अर्थात् मि॰ श्रावण शुक्ल ७ सम्वत् १६८० को गंगाजी के अल्सीघाट पर गोस्वामी तुलसीदासजी ने शरीर त्याग किया। कवित्त रामायण में गोसाँईजी ने लिखा है कि – "बीसी विश्वनाथ की विषाद बड़ो बारानसी, बूझिये न ऐसी गति शङ्कर सहर की। शङ्कर सरोष महामारिहि ते जानियत, साहिब सरोष दुनी दिन दिन दारिदी।" इन पद्यों से विदित होता है कि काशी में महामारी फैली थी, उस समय रुद्रबीसी भोग रही थी। ज्योतिष की गणना से वह समय सम्वत् १६६५ से १६८५ तक का निकलता है। इसी के आधार पर डाक्टर ग्रिअर्सन ने अनुमान किया है कि अन्त समय में गोसाँईजी महामारी से पीड़ित हुए थे, उनकी कोख में गिलटी निकल आई थी और ज्वर भी हुआ था। परन्तु अधिकांश जीवनी लेखक ग्रियर्सन साहब के इस तर्क से सहमत नहीं हैं, वे कहते हैं अन्त समय में गोसाँईजी को कदापि प्लेग की बीमारी नहीं हुई थी।
बादशाह जहाँगीर के बनवाये चित्र में सद्यः रोगमुक्त होने का चिह्न वर्तमान है और वह सम्वत् १६६५ और १६६९ के बीच गोसाँईजी से मिलने काशी आया था। सम्भव है कि उस समय वे महामारी से ग्रसित होकर अच्छे हुए हो जिसे सुन कर स्नेहवश बादशाह उन्हें देखने आया था। जो हो, पर अन्त समय में गोसाँई जी को महामारी नहीं हुई थी। जब स्वर्गारोहण का समय समीप आया, तब वे गङ्गाजी के तट पर जा आसीन हो रामनाम का जाप करने लगे। ठीक यात्रा के समय यह दोहा कह कर परमधाम सिधारे।
रामनाम जस बरनि के, भयउ चहत अब मौन।
तुलसी के मुख दीजिये, अबही तुलसी मौन॥
गोस्वामीजी के ग्रन्थ।
इनके ग्रन्थों की संख्या में भी बड़ा मतभेद है। हिन्दी-नवरत्न में मिश्रबन्धुओं ने २५ ग्रन्थ, तुलसी जीवनी के लेखक ने ३१ ग्रन्थ; शिवसिंह सरोज ने २२ ग्रन्थों की गणना की है। फणेश कवि और महामहोपाध्याय पण्डित सुधाकर द्विवेदी आदि विद्वानों ने भिन्न भिन्न संख्यायें निर्धारित की
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