बन्दि बिप्र सुर गुरु पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति सङ्ग द्वार पग धारे॥१॥
ब्राह्मण, गुरु, देवता, पिता और माताओं को प्रणाम कर सब भाई आशीर्वाद पा कर प्रसन्न हुए। माताओं ने आदर से मुख देखा, फिर राजा के साथ दरवाजे पर पधारे॥४॥
दो॰—कीन्ह सौच सब सहज सुचि, सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिँ, आये चारिउ भाइ॥३५८॥
स्वाभाविक पवित्र चारों भाई सब शौच से निवृत्त हो पवित्र नदी (सरयू) में स्नान किया और प्रातःक्रिया करके पिता के पास आये॥३५८॥
शौचकर्म स्नानादि पवित्रता के लिए किया जाता है, पर चारों भाई सहज ही शुद्ध है। क्रिया का अभिप्राय विशेष्यपद में वर्तमान रहना 'परिकराङ्कुर अलंकार' है।
चौ॰—भूप विलोकि लिये उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥
देखि राम सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥१॥
राजा देख कर हृदय से लगा लिये, आज्ञा पाकर चारों भाई प्रसन्न होकर बैठ गये। रामचन्द्रजी को देख कर सारी सभा नेत्रों के लाभ की सीमा अनुमान कर शीतल हुई॥१॥
पुनि बसिष्ठ मुनि कौसिक आये। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाये॥
सुतन्ह समेत पूजि पग लागे। निरखि राम दोउ गुरु अनुरागे॥२॥
फिर वशिष्ठ मुनि और विश्वामित्रजी आये, राजा ने मुनियों को सुन्दर आसन पर बैठाया। पुत्रों सहित पूजा कर के चरणों में लगे, रामचन्द्रजी को देख कर दोनों गुरु प्रेम से पूर्ण हो गये॥२॥
कहहिँ बसिष्ठ धरम इतिहासा। सुनहिँ महीस सहित रनिवासा॥
मुनि मन अगम गाधि सुत करनी। मुदित बसिष्ठ बिपुल बिधि करनी॥३॥
वशिष्ठजी धार्मिक इतिहास कहते हैं और राजा रनिवास के सहित सुनते हैं। मुनियों के मन में दुर्गम विश्वामित्रजी की करनी को वशिष्ठजी ने बहुत तरह से प्रसन्नतापूर्वक वर्णन किया॥३॥
बोले बामदेव सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माँची॥
सुनि आनन्द भयउ सब काहू। राम-लखन-उर अधिक उछाहू॥४॥
वामदेव मुनि बोले कि सब बातें सत्य हैं, इनकी सुन्दर कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई है। यह सुनकर सब को आनन्द हुआ और रामचन्द्रजी तथा लक्ष्मणजी के हृदय में बड़ा उत्साह हुआ॥४॥
गुटका में 'राम लखन उर अतिहि उछाह' पाठ है।
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