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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/४६५

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रामचरित मानस।

समाधान करि सौ सबही का। गयउ जहाँ दिन-कर-कुल टोको। राम सुमन्त्रहि आवत देखा । आदर कीन्ह पिता सम लेखा ॥३॥

उन्होंने सब के सन्देह को निवारण किया और वहाँ गये जहाँ सूर्य कुल के तिलक (राम- चन्द्रजी) थे। रामचन्द्रजी ने सुमन को आते देखा, उन्हें पिता के समान समझ कर आदर किया ॥३॥

निरखि बदन कहि धूप-रजाई । रघुकुल-दीपहि चलेउ लेलाई। राम कमाति सचित्र सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥2॥

रामचन्द्रजी के मुखाराविन्द को देख राजा की आशा कही और रघुकुल के दीपक (रघुनाथ) को लिवा कर चले । रामचन्द्रजी बुरी तरह (पैदल विना चँवर छत्र के ) मन्त्री के साथ जाते हैं, यह देख कर लोग जहाँ तहाँ विषाद करते हैं।

दो०-जाइ दीख रघुबंस-मनि, नरपति निपट कुसाज। सहमि परेउ लखि सिंधिनिहि, मनहुँ बद्ध गजराज ॥३॥

रघुवंश-मणि [रामचन्द्रजी] ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त कुत्सित समान से पड़े हैं । वे ऐसे मालूम होते हैं मानो सिंहिनी को देख कर वुड्डा हाथी डर से सिकुड़ कर धरती पर पड़ा हो ॥३॥

चौ०--सूखहिँ अधर जरहिं सब अङ्ग । मनहुँ दीन मनि-हीन भुअङ्ग! सरुख समीप दीख कैकेई । मानहुँ मीच घरी गनि लेई ॥१॥

राजा के ओंठ सूख गये हैं और सब ना जला रहे हैं, वे ऐसे मालूम होते है मानो मणि के विना साँप दुखी हो । पास में क्रोध से भरी कैकयी को देखा, वह जान पड़ती है मानों मृत्यु की घड़ी गिन लेती हो ॥१॥

मणि खो जाने पर सर्प दुखी होता ही है । यह 'उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा' है।

करुला-मय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दोख दुख सुना न काऊ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूछो मधुर बचन महतारी ॥२॥

रामचन्द्रजी का स्भाव कोमल और दयामय है, यह पहले ही दुःख देखा । इस के पूर्व कभी कान से दुःख सुना नहीं था। वो भी समय विचार कर धीरज धारण किया और मीठी वाणी माता से बोले ॥२॥

माहि कहु मातु तात दुख कारन । करिय जतन जेहि होइ निवारन ॥ सुनहु राम सब कारन एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू ॥३॥

हे माता ! पिताजी के दुःख का कारण मुझ से कहो, मैं उपाय करूँ जिसमें वह दूर हो । कैकयी ने कहा-हे रामचन्द्र! सुनो, सब कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत स्नेह है ॥३॥