ज्ञानरूप नित्य गुरु में शङ्कर का आरोप 'सम अभेद रूपक' है । शिवजी के गुण से टेढ़े चन्द्र का गुणवान होना 'प्रथम उल्लास' है। संज्ञा साभिप्राय है, क्योंकि गोस्वामीजी अपनी बुद्धि को मलिन मान कर वन्दना करते हैं कि जिन्होंने वक्र चन्द को वन्दनीय बनाया वे मेरी मति निर्मल कर देंगे 'परिकराङ्कुर अलंकार की ध्वनि' है।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥४॥
सीता और रामचन्द्रजी के गुण-समूह रूपी पवित्र वन में बिहार करनेवाले विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर (वाल्मीकि मुनि) और कपीश्वर (हनूमानजी) की मैं वन्दना करता हूँ॥४॥
मुनि और बन्दर कानन-विहारी होते हैं, इसलिये सीताराम के गुण-ग्राम में वन का आरोपण किया गया है। सब वन पुनीत नहीं होते, पर इसमें पवित्रता का गुण 'अधिक अभेद रूपक' है।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥५॥
उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली, फ्लेशों के हरनेवाली, सम्पूर्ण कल्याणों के करने वाली, रामचन्द्र की प्रियतमा सीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥५॥
शार्दूलविक्रीडित-वृत्त।
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः।
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लव एक एव हि भवास्सोधेस्तितीविताम्।
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥६॥
जिनको माया के वश में सम्पूर्ण संसार ब्रह्मादिक देवता और देत्य हैं, जिनके बल से झूठा यह सारा जगत् रस्सी में साँप के भ्रम के समान सत्यप्रतीत होता है। जिनके चरण ही संसार-सागर से पार जाने की इच्छा रखनेवालों के लिये एकमात्र नौका-स्वरूप है, समस्त कारणों से परे जिनका नाम राम है, उन ईश्वर विष्णु भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ॥६॥
ग्रन्थारम्भ में नमस्कारात्मक, वस्तु निर्देशात्मक और आशीर्वादात्मक तीन प्रकार के मङ्गलाचरण होते हैं। गोस्वामीजी ने नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण किया है।