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रामचरित-मानस

चौ०-से तुम्हार धन जीवन प्राना । भूरि-भाग को तुम्हहिँ समाना।
यह तुम्हार आंचरज न ताता। दसरथ-सूअन राम-प्रिय-भ्राता।।१।।

वह (राम-चरणानुराग) आप का जीवन-धन और प्राण है. आप के समान पड़ा भाग्यवान कौन है ? हे तात ! आप के लिये यह आश्चर्य नहीॅ है, क्योॅकि आप दशरथजी के पुत्र और रामचन्द्रजी के प्यारे बन्धु हैॅ ॥१॥

सुनहु भरत रघुबर मन माहीॅ। प्रेमपात्र तुम्ह सम कोउ नाहीॅ।
लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहिँ सराहत बीती ॥२॥

हे भरत ! सुनो, रघुनाथजी के मन मेॅ आपके समान प्रेम का भाजन दूसरा कोई नहीॅ है । लक्ष्मणजी, रामचन्द्र जी और सीताजी को अत्यन्त प्रीती से सारी रात आपकी सराहना करते बीती ॥२॥

जाना मरम नहात प्रयागा। मगन होहिॅ तुम्हरे अनुरागा।
तुम्ह पर अस सनेह रघुबर के । सुखजीवन जग जस जड़नर के ॥३॥

प्रयागराज में स्नान करते समय,मैॅ ने इस भेद को जाना कि आप के प्रेम मेॅ मग्न हो रहे थे। रघुनाथजी का स्नेह आप पर ऐसा है, जैसे संसार मेॅ मूर्ख मनुष्य को सुख से जीवन प्रिय है ॥३॥

नहात प्रयागा मेॅ कोई कोई 'भरत खंडे' सङ्कल्प मेॅ भरतजी का नाम सुन कर प्रसन्न होना कहते हैॅ । यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि दुःख का जीवन ज्ञानी अज्ञानी मूर्ख विज्ञान किसी को प्रिय नहीॅ, फिर ऐसा उदाहरण क्योॅ दिया ? | उत्तर-ज्ञानी सुख और दुःस मेॅ हर्ष विषाद नहीॅ मानते । मूर्ख सुख मेॅ सुनी और दुःख मेॅ दुःखी होते हैॅ। इसी से वह सुख की चाहना करता है, किन्तु ज्ञानी किसी को चाहना वा उपेक्षा नहीॅ करते । बस यही दोनोॅ मेॅ अन्तर है।

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई । प्रनत-कुटुम्ब-पाल रघुराई।
तुम्ह तउ भरत भार मत एहू। धरे देह जनु राम-सनेहू ।।४।।

रघुनाथजी की यह अधिक बड़ाई नहीॅ है, क्योॅकि वे शरणागतोॅ के कुटुम्ब के पासक हैॅ। हे भरत ! मेरा यह सिद्धान्त है कि आप तो ऐसे मालूम होते हैॅ मानोॅ शरीर धारण किये हुए रामचन्द्रजी के स्नेह है ॥४॥

स्नेह शरीरधारी नहीॅ होता, यह मुनि की कल्पनामात्र 'अनुक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार' है।

दो॰-तुम्ह कहँ भरत कलङ्क यह, हम सब कहँ उपदेस ।
रामभगति-रस सिद्धि-हित, मा यह समउ गनेस ॥ २०८॥

हे भरत ! आप को यह कलङ्क हम सब को उपदेश है। रामचन्द्रजी की भक्ति का आनन्द वान्छित-लाभ के लिये यह समय ही श्रीगणेश हुआ है ॥२०८॥