भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुमङ्गल-खानी ॥
दसरथ-गुन-गन बरनि न जाहीॅ । अधिक कहा जेहि सम जगनाहीं ॥४॥
राजाभागीरथ गङ्गाजी को ले आये, जिनका स्मरण सम्पूर्ण सुन्दर महलोॅ की खानि है। दशरथजी के गुण वर्णन नहीॅ किये जा सकते, बढ़ कर तो क्या ? जिनके समान संसार मेॅ कोई नहीॅ है ॥४॥
दो०-जासु सनेह सकोच बस, राम प्रगट भये आइ ।
जे हर-हिय-नयननि कबहुँ, निरखे नहीॅ अघाइ ॥२०६॥
जिनके स्नेह और संकोच वश रामचन्द्रजी आकर धरती पर प्रकट हुए, जिन्हेॅ ह्रदय की आँखोॅ से निरख कर शिवजी कभी अघाते नहीॅ ॥२०६॥
चौ०-कीरसि-बिधु तुम्ह कीन्हि अनूपा । जहँ वस राम-प्रेम मृग-रूपा।
तात गलानि करहु जिय जाये । डरहु दरिद्रहि पारस पाये ॥१॥
आपने कीर्ति रूपी अनुपम चन्द्रमा प्रकट किया, जहाँ रामचन्द्रजी का प्रेम रुपी मृग निवास करता है । हे तात ! अपने मन मेॅ व्यर्थ ही ग्लानि करते हो, पारस पत्थर पाकर दरिद्र से डरते हो ॥१॥
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीॅ। उदासीन तापस बन रहहीॅ ॥
सब सोधन कर सुफल सुहावा । लखन राम सिय दरसन पावा ॥२॥
हे भरत! सुनिये, हम झूठ नहीॅ कहते, क्योॅकि उदासीनभाव, तपस्वी और वन मेॅ रहते हैॅ। सव साधनोॅ का सुन्दर सुहावना फल रामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी का दर्शन पाना है ॥२॥
झूठ न कहने का कारण एक उदासीन भाव ही पर्याप्त है, तिस पर तपस्वी, बनबासी आदि अन्य प्रबल हेतुओॅ का वर्तमान रहना 'वियोय समुच्चय अलंकार' है।
तेहि फल कर फल दरस तुम्हारा । सहित प्रयाग सुभोग हमारा॥
भरत धन्य तुम्ह जग जस जयऊ । कहि अस प्रेम मगन मुनि भयऊ ॥३॥
उस फल का फल आप का दर्शन है, प्रयाग के सहित इमारा सौभाग्य है। हे भरत! आप धन्य हैं जो संसार मेॅ ऐसा निर्मल यश उत्पन्न किया, यह कह कर मुनि प्रेम मेॅ मग्न हो गये॥३।।
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ।
धन्य धन्य धुनि गगन प्रयागा । सुनि सुनि भरत मगन अनुरागा ॥४॥
मुनि के वचन सुन कर सभा के लोग हर्षित हुए और देवता सत्य सत्य कह कर बड़ाई करके फूल बरसाते हैॅ। आकाश और प्रयाग में धन्य धन्य का शब्द भर गया, सुन सुन कर भरतजी प्रेम मेॅ मग्न हो रहे हैं |