मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिय अमिय जग जुरइ न छाछी॥
छमिहहिँ सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिँ बाल बचन मन लाई॥४॥
बुद्धि तो अत्यन्त नीच है, पर अभिलाषा बड़ी ऊँची है, अमृत की चाह है, किन्तु संसार में माठा भी नहीं जुरता है। सज्जन लोग मेरी इस ढिठाई को क्षमा करेंगे और इस बालक की बात मन लगा कर सुनेंगे।
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिँ मुदित मन पितु अरु माता॥
हँसिहहिँ कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर-दूषन भूषन-धारी॥५॥
यदि बालक तुतला कर बात कहता है तो उसको माता और पिता प्रसन्न मन से सुनते हैं। निर्दय, कपटी, बुरे विचारवाले, जो दूसरों के दोषों का ही आभूषण धारण करते हैं वे हँसेंगे॥५॥
सज्जन असज्जन के लक्षण द्वारा अनुमान बल से यह निश्चय कर लेना कि सज्जन माता-पिता की तरह प्रेम से सुनेंगे और दुष्ट प्राणी इस काव्य की हँसी करेंगे 'अनुमान-प्रमाण अलंकार' है।
निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥
जे पर-भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाही॥६॥
अपनी बनाई कविता किसको अच्छी नहीं लगती? चाहे वह रसीली हो अथवा अत्यन्त नीरस हो। जो दुसरे का काव्य सुन कर प्रसन्न होते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष संसार में बहुत नहीं हैं॥६॥
जग बहु नर सरि सर सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हि जल पाई।
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़ड़ जाई ॥७॥
भाई! जगत् में बहुत से मनुष्य नदी और तालाब के समान हैं, जो जल पा कर अपनी बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात् अपनी उन्नति से खुश होते हैं। पर समुद्र के समान सज्जन कोई एक आध ही हैं जो पूर्ण चन्द्रमा (पराये की वृद्धि) देख कर उमड़ते हैं॥७॥
दो॰ – भाग छोट अभिलाष बड़, करउँ एक बिस्वास।
पइहहिं सुख सुनि सुजन जन, खल करिहहिँ उपहास ॥८॥
अभिलाषा बड़ी है भाग्य छोटा है, मैं एक ही विश्वास करता हूँ कि सज्जन लोग इस कविता को सुन कर सुख पावेंगे और दुष्ट लोग निन्दा करेंगे॥८॥
चौ॰ – खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥१॥
दुष्टो के बुराई करने से मेरी भलाई होगी, कौए कोयल को कठोर (वाणीवाली) कहते हैं। बगुला हंस की और मेढक पपीहा की हँसी करते हैं, उसी तरह दुष्ट पापी निर्मल वार्ता (हरिकथा) का मजाक उड़ाते हैं॥१॥