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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/६७१

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रामचरित-मानस

दो०-निसि न नींद नहिं भूख दिन, भरत बिकल सुठि सोच ।
नीच कीच बिच मगन जस, मीनहि सलिल सँकोच ॥२५२॥

भरतजी अत्यन्त सोच से व्याकुल हैं उन्हें न रात में नींद आती है और न दिन में भूख लगती है। जैसे नीच जल कीचड़ के बीच मग्न होता है और पानी के सकोच (सूखने वा घटने) से मछली का दुःख बढ़ता जाता है ॥२५२॥

ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों त्यों भरतजी के हृदय में व्याकुलता बढ़ रही है। इस सामान्य बात की विशेष से समता दिखानी कि जैसे नीच जल कीचड़ में मिलता जाता है उसे मछली के मरने जीने की परवाह नहीं, परन्तु जल के घटने से मछली की व्याकुलता बढ़ती जाती है 'उदाहरण अलंकार है। जल को नीच इसलिये कहा कि वह अपने प्रेमी के दुःख की परवा नहीं करता, उसी तरह समय वीतत्ता जाता है उसे भरतजी के व्याकुलता को चिन्ता नहीं। चित्रकूट में अल्पकाल रहने का समय और जल, भरतजी और मछली, रामचन्द्रजी के लौटने का असमय और कीचड़, समय का बीतना और जल का सूखना परस्पर उपमेय उपमान है ।

चौ०-कीन्ह मातु मिस काल कुचाली । ईतिमीति जस पाकत साली।
केहि बिधि होइ राम-अभिषेकू । मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥१॥

माता के बहाने काल ने कुचाल की, जैसे धान के पकने में ईति (लेती को हानि पहुँचाने उपद्रों) का भय रहता है। किस तरह रामचन्द्रजी को राज्याभिषेक हो, मुझे एक भी उपाय नहीं सूझता है ॥ १॥

माता के बहाने काल की कुचाल कथन करना 'कैतवापन्हुति अलंकार' है।

अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी । मुनि पुनि कहब राम रुचिजानी ।
मातु कहेहु बहुदहिँ रघुराऊ । राम-जननि हठ करबि कि काऊ॥२॥

गुरुजीकी आज्ञा मान कर अवश्य लौटेंगे, फिर मुनि ऐसा काहेको करेंगे? वे रामचन्द्रजी की रुचि समझ कर कहेंगे। माताजी के कहने पर भी रघुनाथजी लौट चलेंगे, पर रामचन्द्रजी की माता क्या कभी हठ करेंगी? (कदापि नहीं) ॥ २ ॥

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि अहँ कुसमउ बाम विधाता ।
जों हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥३॥

मुझ सेवक की कितनी बात है? तिसपर कुसमय है और विधाता विपरीत हैं। यदि हठ करता हूँ तो निरा खोटा कम होगा, क्योंकि सेवक का धर्म कैलास-पर्वत-से अधिक ,गरुआ है ॥३॥

'हर-गिरि' शब्द के श्लेष से कविजी एक गुप्त अर्थ प्रकट करते हैं कि सेवक के धर्म की गुरुता शिवजी और विन्ध्याचल पर्वत से प्रसिद्ध है। सेवा-धर्म की रक्षा के लिये शिवजी ने सती जैसी पतिव्रता स्त्री को त्याग दिया और विन्ध्याचल गुरु अगस्त्यजी की आशा मान कर अब तक धरती पर पड़ा है। यह 'विवृतोक्ति अलंकार' है।