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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/६७३

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रामचरित-मानस

नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ॥
बिधि हरि हर ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥३॥

नीति (उचित व्यवहार) प्रीति (परस्पर का प्रेम) परमार्थ (श्रेष्ठ निमित्त) और स्वार्थ (अपना प्रयोजन ) रामचन्द्र के समान कोई भी यथार्थ नहीं जानता । ब्रह्मा, विष्णु, महेश,चन्द्रमा, सूर्य, दिकपाल, माया, जीव, सम्पूर्ण कर्म और काल ॥३॥

अहिप महिप जहं लगि प्रभुताई । जोग-सिद्धि निगमागम गाई ॥
करि बिचार जिय देखहु नीके । राम रजाइ सीस सबही के॥४॥

शेप, राजा आदि जहाँ तक प्रभुता (घड़ाई) है, योग की सिद्धि जिसको वेद शास्त्रों ने गाई है । अपने मन में अच्छी तरह विचार कर देखिये रामचन्द्र की यात्रा सब के सिर पर हैं ॥४॥

पर यहाँ यह व्यजित होना कि रामचन्द्रजी सब के एकमात्र प्रेरक हैं, उन्हें कौन आशा दे सकता है ? उनकी आशा सभी को मान्य है । तुल्यप्रधान गुणीभूत व्यगं है।

दो०-राखे राम-रजाइ रुख, हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब, सब मिलि सम्मत सोइ ॥२५४॥

रामचन्द्र की श्राशा का रुज रखने ही से हम सब का कल्याण होगा। यह समझ कर अब सब सयाने मिल कर सलाह करो तो वही की जाय ॥२५४॥

चौ०-सब कह सुखद राम-अभिषेकू । मगंल-मोद-मूल भग एकू॥
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ । कहहु समुझिसोइ करिय उपाऊ॥१॥

रामचन्द्र का राज्याभिषेक होना सब को सुखदायी है, एक यही मार्ग मंगल और मानन्द का मूल है । रघुनाथजी किस प्रकार अयोध्या को लौट चलेंगे ? समझ कर कहिये तो मैं वही उपाय करूँ ॥१॥

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय-परमारथ-स्वारथ सानी।
उत्तर न आव लोग भये भोरे । तब सिर नाइ भरत कर जोरे ॥२॥

लव ने सुनिवर की वाणी श्रादर से सुनी, जो नीति, परमार्थ और स्वार्थ से मिली हुई है। लोग भोले (हक्केबके) हो गये, कुछ उत्तर नहीं आता है, तब सिरनवा कर और हाथ जोड़ कर भरतजी बोले ॥२॥

नीति-धर्मधुरीण हैं उन पर उलटा बोझ लादना ठीक नहीं। परमार्थ जगत के कल्याणकारी हैं अकेले हमारे ही नहीं । स्वार्थ लौटना, राजतिलक होना आनन्द का मूल है ।

मानु-बंस भये भूप घनेरे । अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥
जनम हेतु सब कहं पितु-माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥३॥

सूर्यवंश में बहुत से राजा हुए, उनमें एक से एक बढ़कर बड़े हुए हैं । सब के जन्म के कारण माता-पिता हैं और शुभ अशुभ कर्मों के फल देनेवाले विधाता हैं।