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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/६९

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रामचरित मानस।


जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम-प्रताप प्रगट एहि माहीं।
सोइ भरोस मोरे मन आवा। केहि न सुसङ्ग बड़प्पन पावा॥१॥

यद्यपि इसमें एक भी काव्य का आनन्द नहीं है, परन्तु रामचन्द्रजी का प्रताप प्रसिद्ध है। मेरे मन में यही भरोसा आता है कि अच्छे सङ्ग से किसको बड़ाई नहीं मिली है?॥४॥

धूमउ तजइ सहज करुआई। अगर प्रसङ्ग सुगन्ध बसाई
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम-कथा जग-मङ्गल-करनी॥५॥

धुआँ भी अपने स्वाभाविक कड़वेपन को छोड़ देता है, अगर के साथ में अच्छी महक से वासित हो जाता है। कहनूति भद्दी है, पर अच्छी ही वस्तु वर्णन की गई है, रामचन्द्रजी की कथा संसार का मङ्गल करनेवाली है॥५॥

हरिगीतिका-छन्द।

मङ्गल-करनि कलिमल-हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता-सरित की ज्योँ सरित-पावन-पाथ की॥
प्रभु सुजस सङ्गति भनिति मलि होइहि सुजन मन-भावनी।
भव-अङ्ग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥१॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजी की कथा मङ्गल-कारिणी और कलि के पापों को हरनेवाली है। कविता-नदी की चाल इस प्रकार टेढ़ी है, जैसे पवित्र जलवाली (गंगा आदि) नदियों की गति होती है। प्रभु रामचन्द्रजी के सुयश के साथ से कविता अच्छी और सज्जनों के मन में सुहानेवाली होगी। मसान की राख शिवजी के अन्त में शोभायमान होकर स्मरण करने से पवित्र करती है॥३॥

दो॰ – प्रिय लागिहि अति सबहि मम, भनिति ति राम-जस-सङ्ग।
दारु बिचार कि करइ कोउ, बन्दिय मलय प्रसङ्ग।

श्रीरामचन्द्रजी के यश के साथ के कारण मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्यारी लगेगी। मलयाचल के प्रसङ्ग से चन्दन की वन्दना करने में क्या कोई काठ का विचार करता है? (कदापि नहीं)।

स्याम-सुरभि-पय बिसद अति, गुनद-करहिं सब पान।
गिराग्राम्य सिय-राम-जस, गावहिँ सुनहिँ सुजान॥१०॥

काली गाय का दूध उज्ज्वल और अत्यन्त गुण-दायक जान कर सब पान करते हैं। उसी तरह-गँवारी बोली में कहे हुए भी सीतारामजी के यश को सज्जन लोग गान करते हैं और सुनते हैं॥१०॥