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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/७८

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प्रथम सोपान, बालकाण्ड।


प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥
राम-चरन-पङ्कज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥२॥

(चारों भाइयों में) पहले मैं भरतजी के चरणों में प्रणाम करता हूँ, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता। रामचन्द्रजी के चरण कमलों में जिनका मन भ्रमर के समान आसक्त होकर उनका साथ नहीं छोड़ता॥२॥

बन्दउँ लछिमन-पद-जल जाता । सीतल सुभग भगत-सुखदाता॥
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड-समान भयउ जस जाका॥३॥

लक्षमणजी के चरण-कमलों की मैं बन्दना करता हूँ, जो सुन्दर शान्तरूप और भक्तों को सुख देनेवाले हैं। रघुनाथजी का निर्मल यश पताका रूप है, जिनका यश (उस ध्वजा को फहराने-वाला) बाँस के समान हुआ॥३॥

सेष सहस्त्र-सीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि-भय-टारन॥
सदासा सानुकूल रह मा पर। कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर॥४॥

जो जगत् के कारण (आधार भूत) हज़ार सिरवाले शेषनाग पृथ्वी का डर दूर करने के लिए जन्म लिया, वे कृपासागर गुणों की खान, सुमित्रानन्दन मुझ पर सदा प्रसन्न रहे॥४॥

जो सहस्र सिरवाले शेष पृथ्वी के कारण अर्थात् उसको अपने ऊपर सँभाल रखनेवाले हैं, उनका पृथ्वी पर अवतार लेना कथन-कारण से विरुद्ध कार्य की उत्पत्ति 'पञ्चम विभावना अलंकार' है।

रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥
महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आपु बखाना॥५॥

शत्रुघनजी के चरण-कमलो को मैं नमस्कार करता हूँ, जो शरवीर, सुन्दर, शीलवान और भरतजी के (सेवक) पीछे चलनेवाले हैं। महाबली हनूमानजी को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनके यश को रामचन्द्रजी ने श्रीमुख से बखान किया है॥५॥

सो॰ – प्रनवउँ पवन कुमार, खल बन पावक ज्ञान घन।
जासु हृदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥

पवन कुमार को प्रणाम करता हूँ, जो खल रूपी वन के लिए अग्नि रुप और ज्ञान की राशि हैं। जिनके हृदय-रूपी मन्दिर में धनुष-बाण धारण किये हुए रामचन्द्रजी निवास करते हैं॥१७॥

खलों में वन का आरोप करने के कारण हनूमानजी में अग्नि का आरोप किया गया है; क्योंकि वन को जलाने के लिए अग्नि ही समर्थ है। यह 'परम्परित रूपक अलंकार' है।