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योरप की यात्रा।

कर लोग प्रातःकाल का प्रणाम कर रहे हैं; और, गरमी के अधिककम होने के बारे में अपना अपना मत प्रकट कर रहे हैं।

नव का घंटा बजा। भोजन भी तैयार हो गया। खाने की इच्छा रखनेवाले स्त्री-पुरुष डेक पर से नीचे उतर कर भोजन-गृह में जाने लगे। डेक पर कोई भी नहीं रह गया। केवल कुरसियाँ अपने मालिकों की राह देख रही है।

भोजन-गृह बहुत बड़ा है। बीच में दो बड़ी बड़ी टेबलें रक्खी हुई है और उनके दोनों ओर और भी छोटी छोटी कई टेबलें रक्खी हुई हैं। दाहनी ओर की एक छोटी टेबल पर जाकर हम सात आदमी दिन में तीन बार भोजन करते हैं। मांस-रोटी-फल-मूल-मिठाई-मदिरा और हंसी-मज़ाक़ तथा बातचीत से उस घर का कोना कोना परिपूर्ण हो उठता है।

भाजन समाप्त हो गया। भोजन-गृह से निकल कर लोग फिर ऊपर डेक पर जाने लगे। डेक पर जा कर अपनी अपनी कुरसी ढूंढ कर यथास्थान रखने में लोग व्यस्त हो गये। पर ढुढ़ कर कुरसियों का पालेना सहज न था। प्रातःकाल डेक धाने के समय किसकी कुरसी कहाँ रखी गई है, इसका कुछ ठीक ठिकाना नहीं।

किसी प्रकार कुरसी मिल भी गई तो उसके लिए स्थान नियत कर लेना और भी महाकठिन काम है। जहाँ हवा आती हैं, जहाँ धूप कम लगती है, जिमको जहाँ बैठने का अभ्यास है या जो जहाँ बैठना पसन्द करता है वह वहीं अपनी कुरसी रखने के अनेक प्रयत्न करता है। एक बार कुरसी रख देन पर दिन भर की चिन्ता जाती रहती है।