पृष्ठ:विचित्र प्रबंध.pdf/२७५

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विचित्र प्रबन्ध ! प्राधुनिक है । इसी से वह नवाबों के समान बड़ी शेखी से घूमता- फिरता है । परन्तु उसकी यह शेखी मुझसे देखी नहीं जाती। इतना कह कर व्योम फिर गुड़गुड़ा पीने लगा। श्रीमती दीप्ति ने व्याम को तिरस्कार की दृष्टि से देख कर कहा--विज्ञान में एक नया तत्त्र आविष्कृत हुआ है। उसका नाम है प्राकृतिक निर्वाचन । इस प्राकृतिक निर्वाचन का नियम कंवल पशुओं में ही नहीं है किन्तु मनुष्यों में भी इस नियम का परिचय पाया जाता है। इसी नियम के अनुसार मयूरी के पंछ नहीं होती और मयूर सुन्दर होता है । कविता की सुन्दरता भी इसी प्राकृतिक निर्वाचन का फल है। इसमें कवियों का किसी प्रकार का षड्यन्त्र नहीं है । सभी देशों में, चाहे वे श्रमभ्य हो या सभ्य, कविता अपने छन्दों में विकसित होती है। श्रीयुत वायु अभी तक चुपचाप बैठे सब बातें सुन रहे थे और मुसकुराते भी थे। जब उन्होंने देखा कि दीप्ति भी विचार में शामिल हो रही है तब उनसे नहीं रहा गया । वे एक अदभुत बात कहने लगे। उन्होंने कहा -~-कृत्रिमता हो मनुष्यों का प्रधान गौरव है। मनुष्य के सिवा और किसी को भी कृत्रिम होने का अधिकार नहीं। वृक्ष अपने पत्ते स्वयं नहीं बनाते, आकाश भी अपनी नीलिमा उत्पन्न नहीं करता, और मार को पूँछ को भी स्वयं प्रकृति ही चित्र- विचित्र बनाती है। केवल मनुष्य को ही यह अधिकार है कि वह अपने लिए रचना करे। एक छोटी मोटी सृष्टि उत्पन्न करने का अधि. कार मनुष्य के हाथ में विधाता ने दिया है । इस कार्य में जिस मनुष्य ने जितनी दक्षता दिखाई है उसका आदर भी उतना ही जन-