पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१०३

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- - विनय-पत्रिका १०६ वाले हैं, राजाका शरीर होनेपर भी आपका खरूप तपोमय है। आप अज्ञानसे परे और तपस्वी हैं। मान, मद, काम, मत्सर, कामना और मोहरूपी समुद्रके मथनेके लिये आप मन्दराचल हैं; आप बडे विचार- शील हैं ॥ ४॥ वेदोंमें प्रसिद्ध, वर देनेवाले देवताओंके स्वामी, वामन, विरक्त, विमल, वाणीके अधीश्वर और वैकुण्ठके खामी हैं। आप काम, क्रोध, लोभ आदिके नाश करनेवाले, क्षमा बढ़ानेवाले, शान्ति- रूप और पक्षिराज गरुडपर चढ़कर जानेवाले हैं ॥५॥ आप परम पवित्र और पापपुनरूपी मूंजके वनको पलभरमें जडसहित जला देनेवाले अग्निरूप हैं। आप ब्रह्माण्डके भूषण, दूपण दैत्यके शत्रु, जगत्के खामी, पृथ्वीके पति, वेदके मस्तक और सारे विश्वका भरण- पोषण करनेवाले हैं। आपकी जय हो ॥ ६॥ आप निर्मल, एकरस, कलारहित, कलासहित और कलियुगके तापसे तपे हुए जीवोंकी व्याकुलताका नाश करनेवाले, आनन्दकी राशि हैं । आप शेषनागपर शयन करते हैं, आपके नेत्र अत्यन्त प्रफुल्लित कमलके समान हैं। आप व्यक्तरूपसे क्षीर-सागरमें निवास करते हैं और अव्यक्तरूपसे सबमें रहते हैं ।। ७॥ सिद्धों, कवियों और विद्वानोंको सुख देनेवाले आपके वे चरण-युगल दुष्टात्मा मनुष्योंको वडे दुर्लभ हैं, जिन पवित्र चरणोंसे परम पवित्र जलवाली गङ्गाजी निकली हैं, जिनके दर्शनमात्रसे ही पाप दूर हो जाते हैं|॥ आप नित्य हैं,मायासे सर्वथा मुक्त हैं, दिव्य- गुणसम्पन्न हैं, तीनों गुणोंसे रहित है, आनन्दवरूप हैं, छः प्रकारके ऐश्वर्यसे युक्त भगवान् हैं, नियमोंके कर्ता और सबपर शासन करने- वाले हैं। आप समस्त विश्वके पालन-पोषण करनेवाले, जगत्के आदि-कारण और शरणागत तुलसीदासका भय हरनेवाले हैं ॥९॥