पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/११०

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विनय-पत्रिका वपुष ब्रह्माण्डसुप्रवृत्तिलंका-दुर्ग,रचितमन दनुजमय-रूपधारी। विविध कोशौघ, अति रुचिर-मंदिर-निकर, सत्वगुण प्रमुख कटककारी ॥२॥ कुणप-अभिमान सागर भयंकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर __अपारं। नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल. संग-संकल्प वीची-विकारं ॥ मोह दशमौलि, तद्भात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी। लोभ अतिकाय,मत्सर महोदर दुष्ट,क्रोध पापिष्ठ-विवुधांतकारी॥ द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट, दर्प मनुजाद मद-शूलपानी। अमितवल परम दुर्जय निशाचर निकर सहित षड्वर्ग गो- यातुधानी ॥५॥ जीवभवदंघि-सेवक विभीषण वसतमध्य दुष्टाटवीग्रसितचिता । नियम-यम सकल सुरलोक-लोकेश लंकेश चश नाथ ! अत्यंत भीता ॥ ६॥ शान-अवधेश-गृह गेहिनी भक्ति शुभ, तत्र अवतार भूभार-हता। भक-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि- भर्ता ॥ ७॥ कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट विपुल शान-सुग्रीवकृत ___ जलधिसेतू। प्रवल वैराग्य दारुण प्रभंजन-तनय, विषमवन भवनमिवधूमकेतू ॥ दुष्ट दनुजेश निवेशकृत दासहित, विश्वदुख-हरण वोधैकरासी। अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा दासतुलसी हृदय. कमलवासी ॥९॥ भावार्थ-हे लक्ष्मीरमण! इस संसार-सागरमें डूबते हुए मुझको वि० पर-