पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/११२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका उतारनेके लिये अवतार लिया था; वैसे ही हे जानकीवल्लभ ! ज्ञानरूपी दशरथके घर, शुभ भक्तिरूपी कौशल्याजीके द्वारा ( इन मोहादि राक्षसोंका नाश करनेके लिये) प्रकट होइये और जैसे भक्तों- का कष्ट देखकर पिताकी आज्ञासे आप उस समय वन पधारे थे (वैसे ही मेरे हृदयरूपी वनमें पधारिये)॥७॥ मोक्षके जो सब साधन हैं, उन अनेक रीछ-बन्दरोंके द्वारा ज्ञानरूपी सुग्रीवसे ( संसार) सागरपर पुल बँधा दीजिये। फिर प्रवल वैराग्यरूपी महाबलवान् पवनकुमार हनुमान्जी विषयरूपी वन और महलोंको अग्निके समान भस्म कर देंगे ॥ ८॥ तदनन्तर हे केवल ज्ञानधन ! हे सारे विश्वका दुःख हरनेवाले श्रीरामजी! जीवरूपीदासके लिये मोहरूपी दुष्ट दानवका वंशसहित नाश कर दीजिये और तुलसीदासके हृदयकमलमें सदा-सर्वदा छोटे भाई लक्ष्मण और श्रीजानकीजीसहित निवास कीजिये ॥९॥ [५९] देव-. दीन-उद्धरण रघुवर्य करुणाभवन, शमन-संताप, पापौघहारी। विमल विज्ञान-विग्रह अनुप्रहरूप, भूपवर विबुध नर्मद,खारी॥१॥ संसार-कांतार अतिघोरगंभीर,घन गहन तरुकर्म संकुल,मुरारी। वासना वल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निबिड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥२॥ विविध चितवृत्ति-खग निकर श्येनोलूक, काक वक गृध्र आमिष- अहारी अखिल स्खल, निपुण छल, छिद्र निरखतसदा, जीवजनपथिकमन- खेदकारी॥३॥