पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/११३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका ११६ क्रोध करिमत्त, मृगराज कंदर्प, मद-दर्पवृक-भालु अति उग्रकर्मा । महिषमत्सर क्रूर लोभशंकररूप, फेरु छल, दंभ मार्जारधर्माnen कपट मर्कट विकट, व्याघ्र पाखण्डमुख, दुखद मृगवात, उत्पातकर्ता। हृदय अवलोकि यह शोक शरणागतं पाहि मां पाहि भो विश्वभर्ता ॥ ५॥ प्रवल अहँकारदुरघट महीधर, महामोहगिरि-गुहानिबिड़ांधकारं। चित्तवेताल,मनुजादमन,प्रेतगनरोग, भोगौघवृश्चिक-विकारं॥६॥ विषय-सुख-लालसा दंश-भशकादि, खल झिल्लि रूपादि सब सर्प, खामी। तत्र आक्षिप्त तव विषममाया नाथ, अंध मैं मंद व्यालादगामी॥७॥ घोर, अवगाहभव आपगा पापजलपूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा । मकर षड्वर्ग, गो नक, चकाकुला, कूल शुभ-अशुभ, दुःख तीव्र धारा॥८॥ सकल संघट पोच शोचवश सर्वदादासतुलसी विषम गहनग्रस्तं । त्राहि रघुवंशभूपण कृपाकर, कठिन काल विकराल-कलित्रास- त्रस्तं ॥९॥ भावार्थ-हे श्रीरामजी! आप दीनोंका उद्धार करनेवाले, रघुकुलमें श्रेष्ठ, करुणाके स्थान, सन्तापका नाश करनेवाले और पापोंके समूहके हरनेवाले हैं। आप निर्विकार, विज्ञान-खरूप, कृपा- मूर्ति राजाओंमें शिरोमणि, देवताओंको सुख देनेवाले तथा खरनामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे मुरारे ! यह संसाररूपी वन बडा ही भयानक और गहरा है। इसमें कर्मरूपी वृक्ष बड़ी ही सघनतासे लगे हैं। वासनारूपी लताएँ लिपट रही हैं और व्याकुलतारूपी अनेक पैने