पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/११४

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११७ विनय-पत्रिका काँटे बिछ रहे हैं । इस प्रकार यह सघन वृक्ष-समूहोंका महाघोर वन है॥ २॥ इस वनमें, चित्तकी जो अनेक प्रकारकी वृत्तियाँ है, सो मांसाहारी बाज, उल्लू, काक, बगुले और गिद्ध आदि पक्षियोंका समूह है। ये सभी बड़े दुष्ट और छल करनेमें निपुण हैं । कोई छिद्र देखते ही यह जीवरूपी यात्रियोंके मनको सदा दुःख दिया करते हैं ॥ ३॥ इस संसारवनमें क्रोधरूपी मतवाला हाथी, कामरूपी सिंह, मदरूपी मेडिया और गर्वरूपी रीछ है, ये सभी बडे निर्दय हैं । इनके सिवा यहाँ मत्सररूपी क्रूर भैंसा, लोभरूपी शूकर, छलरूपी गीदड़ और दम्भरूपी बिलाव भी हैं॥ ४॥ यहाँ कपटरूपी विकट बंदर और पाखण्डरूपी बाघ हैं, जो संतरूपी मृगोंको सदा दुःख दिया करते और उपद्रव मचाया करते हैं । हे विश्वम्भर ! हृदयमें यह शोक देखकर मैं आपकी शरण आया हूँ, हे नाथ ! आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये॥५॥ इस संसार-बनमें ( इन जीव- जन्तुओंसे बच जानेपर भी आगे और विपद् है ) अहंकाररूपी बड़ा विशाल पर्वत है, जो सहजमें लाँघा नहीं जा सकता । इस पर्वतमें महामोहरूपी गुफा है, जिसके अंदर घना अन्धकार है। यहाँ चित्तरूपी वेताल, मनरूपी मनुष्य-भक्षक राक्षस, रोगरूपी भूतप्रेतगण और भोगविलासरूपी विच्छुओंका जहर फैला हुआ है ॥६॥ यहाँ विषय सुखकीलालसारूपी मक्खियॉऔर मच्छर हैं, दुष्ट मनुष्यरूपी झिल्ली है और हे खामी ! रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श विषयरूपी सर्प हैं। हे नाथ ! आपकी कठिन मायाने मुझ मूर्खको यहाँ लाकर पटक दिया है । हे गरुड़गामी ! मैं तो अन्धा हूँ, अर्थात् ज्ञाननेत्र- विहीन हूँ ॥७॥ इस संसार-वनमें बहनेवाली वासनारूपी